सनातन धर्म की पावन परंपराओं में पुरुषोत्तम मास का स्थान अत्यंत उच्च और कल्याणकारी माना गया है। यह मास भगवान श्रीहरि की विशेष कृपा प्राप्त करने का दुर्लभ अवसर है। इस दिव्य काल में किए गए जप, तप, दान और व्रत साधक के जीवन को पवित्र बनाते हैं और उसे भौतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करते हैं।
अभी तक आपने पुरुषोत्तम मास की महिमा अध्याय 1 से 10 तक की कथा में, उसकी उत्पत्ति और भगवान की अनुकंपा के अनेक अद्भुत प्रसंगों का श्रवण किया। अब आगे बढ़ते हुए अध्याय 11 से 20 तक की कथा में और भी गूढ़ रहस्य, प्रेरणादायक प्रसंग तथा धर्म, भक्ति और तपस्या के उच्च आदर्शों का विस्तार से वर्णन मिलता है।
अब श्रद्धा और भक्ति के साथ पुरुषोत्तम मास महात्म्य कथा के अध्याय 11 से 20 के दिव्य प्रसंगों का रसपान करें और अपने जीवन को धर्ममय तथा पुण्यमय बनाने की प्रेरणा प्राप्त करें।
सूतजी बोले, हे मुनिश्रेष्ठ! अब मैं आपको उस अद्भुत कथा का सार सुनाता हूँ, जिसमें एक तपस्विनी कन्या की कठोर साधना, भगवान शंकर की कृपा और पुरुषोत्तम मास के महत्त्व का गूढ़ रहस्य प्रकट होता है।
नारदजी के प्रश्न करने पर श्रीनारायण बोले: एक समय एक ऋषि की कन्या ने भगवान शिव को पति रूप में पाने की इच्छा से अत्यंत कठिन तपस्या आरम्भ की। वह कन्या अत्यंत दृढ़ निश्चयी और धैर्यवान थी। उसने ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि के मध्य बैठकर तप किया, शीतकाल में ठंडे जल में खड़ी रही और वर्षा ऋतु में खुले आकाश के नीचे बिना किसी आश्रय के निवास किया। इस प्रकार उसने हजारों वर्षों तक तप करते हुए अपने शरीर को क्षीण कर लिया, परंतु उसकी भक्ति और संकल्प अडिग रहे।
उसकी ऐसी कठोर तपस्या को देखकर देवराज इन्द्र भी चिंतित हो उठे, किन्तु वह कन्या अपने लक्ष्य से तनिक भी विचलित नहीं हुई। अंततः उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर उसके समक्ष प्रकट हुए। उनके दिव्य स्वरूप के दर्शन पाकर वह कन्या अत्यंत प्रसन्न हुई और विनम्र भाव से उनकी स्तुति करने लगी। उसने भगवान शिव को दुखों का नाश करने वाले और भक्तों के रक्षक के रूप में प्रणाम किया।
भगवान शंकर उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर बोले, “हे तपस्विनी! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, तुम जो चाहो वर मांगो।”
यह सुनकर वह कन्या अत्यंत हर्षित हुई और बार-बार एक ही वर मांगने लगी, “हे प्रभो! मुझे पति दीजिए, मुझे पति दीजिए।” उसने अपनी इस इच्छा को पाँच बार दोहराया।
तब भगवान शंकर ने मुस्कराकर कहा, “हे सुन्दरी! तुमने पाँच बार पति माँगा है, इसलिए अगले जन्म में तुम्हें पाँच पति प्राप्त होंगे। वे सभी वीर, धर्मज्ञ और गुणवान होंगे।”
यह सुनते ही कन्या व्याकुल हो उठी। वह हाथ जोड़कर बोली, “हे प्रभु! संसार में एक स्त्री का एक ही पति होता है, पाँच पति होना तो लोकविरुद्ध है। कृपया मुझे ऐसा वर न दें जिससे मेरी हँसी हो।”
तब भगवान शंकर गंभीर होकर बोले, “हे बाले! यह सब तुम्हारे पूर्व कर्मों का फल है। तुमने पूर्व जन्म में महर्षि दुर्वासा का अपमान किया और पुरुषोत्तम मास का अनादर किया। उसी के कारण तुम्हें यह फल प्राप्त होगा। इस जन्म में तुम्हें पति सुख नहीं मिलेगा, पर अगले जन्म में तुम बिना योनि के उत्पन्न होकर पाँच पतियों का सुख भोगोगी और अंत में परम पद को प्राप्त करोगी।”
शिवजी ने आगे कहा, “पुरुषोत्तम मास अत्यंत पवित्र और कल्याणकारी है। जो इसका श्रद्धा से पालन करता है, वह सुख, समृद्धि और मोक्ष को प्राप्त करता है। परंतु जो इसका अपमान करता है, उसे विपरीत फल भोगना पड़ता है।”
ऐसा कहकर भगवान शंकर वहाँ से अंतर्धान हो गए। उनके चले जाने पर वह कन्या अत्यंत दुःखी और चिंतित हो गई, मानो कोई मृगी अपने समूह से बिछुड़ गई हो।
सूतजी बोले- हे मुनियों! इस प्रकार यह कथा हमें यह शिक्षा देती है कि भक्ति और तपस्या का फल अवश्य मिलता है, किन्तु धर्म के नियमों और पुरुषोत्तम मास के महत्व को समझकर उसका पालन करना भी अत्यंत आवश्यक है।
सूतजी बोले- हे मुनिश्रेष्ठ! अब मैं आपको उस कथा का सार सुनाता हूँ, जिसमें उस तपस्विनी कन्या के अगले जन्म, द्रौपदी के जीवन और पुरुषोत्तम मास के महान प्रभाव का अद्भुत वर्णन है।
नारदजी ने विनम्र होकर पूछा, “हे प्रभो! जब भगवान शंकर अंतर्धान हो गए, तब उस बाला ने शोक में क्या किया?”
तब श्रीनारायण बोले, “हे नारद! यही प्रश्न एक बार राजा युधिष्ठिर ने भी भगवान श्रीकृष्ण से किया था, अब वही कथा मैं तुम्हें सुनाता हूँ।”
श्रीकृष्ण बोले, “हे राजन्! शिवजी के चले जाने पर वह कन्या अत्यंत दुखी हो गई। वह भय और शोक से व्याकुल होकर रोने लगी। उसका शरीर तपस्या से पहले ही क्षीण था, अब दुःख की अग्नि ने उसे और भी जला दिया। वह ऐसे प्रतीत होती थी जैसे वनाग्नि में जली हुई कोई लता। समय बीतता गया और अंततः काल के प्रभाव से वह अपने आश्रम में ही शरीर त्याग कर बैठी।”
“हे राजन्! उसी समय यज्ञसेन नामक राजा ने एक महान यज्ञ किया। उस यज्ञकुण्ड से एक दिव्य तेजस्विनी कन्या उत्पन्न हुई। वही कन्या आगे चलकर राजा द्रुपद की पुत्री ‘द्रौपदी‘ के नाम से प्रसिद्ध हुई। पूर्व जन्म की वही तपस्विनी कन्या अब द्रौपदी के रूप में जन्मी थी।”
“उसका स्वयंवर हुआ, जिसमें अर्जुन ने मछली की आँख भेदकर उसे प्राप्त किया। परंतु आगे चलकर उसे अत्यंत कष्टों का सामना करना पड़ा। दुर्योधन के सभा में दुःशासन ने उसके केश पकड़कर उसे अपमानित किया। उस समय उसने अत्यंत व्याकुल होकर मुझे पुकारा, “हे कृष्ण! हे दीनबंधु! अब मेरा कोई नहीं, आप ही मेरे रक्षक हैं।”
“प्रथम पुकार में मैंने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि उसने पूर्व में पुरुषोत्तम मास का अनादर किया था। परंतु जब उसने पूर्ण समर्पण भाव से पुनः मुझे पुकारा, तब मैं तुरंत वहाँ पहुँचा और उसकी लाज की रक्षा की।”
श्रीकृष्ण आगे बोले, “हे राजन्! द्रौपदी मेरी अत्यंत प्रिय भक्त थी, परंतु पुरुषोत्तम मास का अपमान करने के कारण उसे कष्ट सहना पड़ा। जो पुरुषोत्तम का तिरस्कार करता है, उसका पतन निश्चित है। और जो भक्तों को पीड़ा देता है, वह मेरा सबसे बड़ा शत्रु होता है।”
इसके बाद श्रीकृष्ण ने पाण्डवों को आश्वासन दिया कि वे उनके शत्रुओं का नाश करेंगे और उन्हें पुनः राज्य प्राप्त होगा। उन्होंने कहा, “हे पाण्डवों! तुम पुरुषोत्तम मास का विधिपूर्वक व्रत और पूजन करो, इससे तुम्हारा कल्याण होगा।‘
फिर श्रीकृष्ण द्वारका जाने लगे। पाण्डव अत्यंत भावुक होकर बोले, “हे प्रभु! आप ही हमारे जीवन हैं, हमें कभी मत भूलिए।”
श्रीकृष्ण प्रेमपूर्वक उन्हें समझाकर द्वारका लौट गए। उनके जाने के बाद पाण्डवों ने तीर्थों में भ्रमण किया और पुरुषोत्तम मास आने पर विधिपूर्वक व्रत किया। चौदह वर्षों के पश्चात् श्रीकृष्ण की कृपा से उन्होंने अपना राज्य पुनः प्राप्त किया।
सूतजी अंत में कहते हैं, “हे मुनियों! पुरुषोत्तम मास का माहात्म्य इतना महान है कि उसे पूर्ण रूप से कोई नहीं जान सकता। स्वयं भगवान ही इसके सम्पूर्ण प्रभाव को जानते हैं। जो मनुष्य श्रद्धा और नियमपूर्वक इस मास का पालन करता है, वही वास्तव में धन्य और पूजनीय होता है।”
सूतजी बोले, “हे मुनिश्रेष्ठो! अब मैं आपको उस पवित्र कथा का सार सुनाता हूँ, जिसमें धर्मात्मा राजा दृढ़धन्वा के जीवन, उनके वैभव और अंतर्मन में उठे वैराग्य के भाव का अद्भुत वर्णन है।”
ऋषियों ने विनम्र होकर कहा, “हे सूतजी! पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से राजा दृढ़धन्वा ने कैसे राज्य, परिवार और अंत में भगवान का परमधाम प्राप्त किया? कृपा करके इस कथा को विस्तार से कहिए।”
तब सूतजी बोले, “हे विप्रों! यह कथा स्वयं भगवान नारायण ने नारदजी से कही थी, वही अब मैं आप सभी को सुनाता हूँ।”
श्रीनारायण बोले, “हे नारद! हैहय देश में चित्रधर्मा नाम का एक धर्मात्मा और प्रतापी राजा था। उसका पुत्र दृढ़धन्वा अत्यंत तेजस्वी, सत्यवादी, धर्मपरायण और गुणों से युक्त था। वह बाल्यावस्था से ही अत्यंत बुद्धिमान था और गुरु से वेद-शास्त्रों का अध्ययन कर, उनकी आज्ञा लेकर अपने पिता के पास लौट आया। उसे देखकर राजा चित्रधर्मा अत्यंत प्रसन्न हुए।”
समय आने पर राजा चित्रधर्मा ने वैराग्य धारण किया और राज्य का भार दृढ़धन्वा को सौंपकर स्वयं वन में तप करने चले गए। वहाँ भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए उन्होंने तप किया और अंततः परमधाम को प्राप्त हुए।
पिता के वियोग से राजा दृढ़धन्वा को शोक हुआ, परंतु उन्होंने धर्म के अनुसार सभी संस्कार पूर्ण किए और फिर राज्य संचालन में लग गए। वे अत्यंत न्यायप्रिय, पराक्रमी और गुणवान राजा थे। उनकी पत्नी गुणसुन्दरी अत्यंत रूपवती और पतिव्रता थी, जिनसे उन्हें चार वीर पुत्र और एक कन्या प्राप्त हुई।
राजा दृढ़धन्वा के राज्य में सुख-समृद्धि थी। वे विद्या, शौर्य और नीति में निपुण थे, तथा अपने शत्रुओं का नाश करने वाले थे। परंतु एक दिन उनके मन में एक गहरी चिंता उत्पन्न हुई।
एक रात्रि उन्होंने सोचा, “मैंने न तो कोई विशेष तप किया, न दान दिया, न यज्ञ किया, फिर भी मुझे इतना वैभव कैसे प्राप्त हुआ? इसका कारण क्या है?”
इस प्रश्न ने उनके मन को व्याकुल कर दिया। अगले दिन वे वन में शिकार के लिए गए। वहाँ एक मृग का पीछा करते-करते वे गहन वन में पहुँच गए। प्यास से व्याकुल होकर उन्होंने एक सरोवर से जल पिया और एक विशाल वटवृक्ष के नीचे विश्राम करने लगे।
उसी समय वहाँ एक अद्भुत तोता (शुक पक्षी) आया, जो मनुष्य की वाणी में एक गूढ़ श्लोक बार-बार बोलने लगा, “हे मनुष्य! इस संसार के क्षणभंगुर सुखों में फँसकर तू आत्मतत्त्व का चिंतन नहीं करता, तो इस संसार-सागर से पार कैसे होगा?”
उस श्लोक को सुनकर राजा चकित और मोहित हो गए। वे सोचने लगे, “क्या यह कोई दिव्य पुरुष है? क्या यह स्वयं शुकदेवजी हैं, जो मेरा उद्धार करने आए हैं?”
इतने में उनकी सेना वहाँ पहुँच गई और वह शुक पक्षी अंतर्धान हो गया।
राजा उस गूढ़ वचन को मन में धारण कर अपने नगर लौट आए। अब उनका मन संसार से हटने लगा। वे मौन रहने लगे, भोजन त्याग दिया और किसी से बात नहीं करते थे।
उनकी यह अवस्था देखकर रानी गुणसुन्दरी अत्यंत चिंतित हुई। उसने विनम्रता से पूछा, “हे स्वामी! आपको क्या चिंता है? आप मौन क्यों हैं? कृपया अपने मन की बात कहिए।”
परंतु राजा उस शुक के वचनों में इतने डूबे हुए थे कि उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। रानी भी उनके दुःख का कारण न जान सकी और अत्यंत व्याकुल रहने लगी।
इस प्रकार राजा दृढ़धन्वा गहन चिंतन और वैराग्य में डूबे रहे, और उनके जीवन में अब एक नया मोड़ आने वाला था।
श्रीनारायण बोले, “हे नारद! अब आगे की कथा सुनो। राजा दृढ़धन्वा, जो शुक पक्षी के वचनों से अत्यंत चिंतित थे, उसी समय उनके महल में महर्षि वाल्मीकि पधारे।”
राजा ने दूर से ही उन्हें आते देखा तो तुरंत उठकर अत्यंत विनम्रता और श्रद्धा से उनके चरणों में दण्डवत प्रणाम किया। विधिपूर्वक उनका पूजन कर उन्हें उच्च आसन पर बैठाया, उनके चरणों को अपने हाथों से धोकर उस चरणामृत को बड़े हर्ष से अपने मस्तक पर धारण किया।
फिर शुक पक्षी की बात स्मरण करते हुए मधुर वाणी में बोले, “हे भगवन्! आज मैं धन्य हो गया हूँ। आपके दर्शन से मेरा जीवन सफल हो गया। आज मेरे सभी मनोरथ पूर्ण हो गए हैं। आपके दर्शन से शास्त्रों का सार समझ में आ गया है। मेरे सौभाग्य का वर्णन करना भी कठिन है।”
राजा के विनम्र वचन सुनकर महर्षि वाल्मीकि अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, “हे राजन्! तुम इतने चिंतित क्यों हो? अपने मन की शंका निःसंकोच कहो, जिससे उसका समाधान हो सके।”
तब राजा दृढ़धन्वा बोले, “हे मुनिवर! आपके चरणों की कृपा से सब कुछ सुखद है, परंतु मेरे हृदय में एक गहरा संदेह उत्पन्न हो गया है। वन में एक शुक पक्षी ने मुझे एक रहस्यमयी वचन कहा, “इस संसार के अतुल सुखों में डूबकर तू आत्मतत्त्व का चिंतन नहीं करता, तो संसार-सागर से पार कैसे होगा?”
हे प्रभो! मैं उस वचन का अर्थ नहीं समझ पाया। साथ ही यह भी जानना चाहता हूँ कि मुझे यह राज्य, परिवार और वैभव किस पुण्य के कारण प्राप्त हुआ है?
राजा की बात सुनकर महर्षि वाल्मीकि ने ध्यान लगाकर उनके पूर्व जन्म का ज्ञान प्राप्त किया और बोले, “हे राजन्! पूर्व जन्म में तुम द्रविड़ देश में ताम्रपर्णी नदी के तट पर रहने वाले ‘सुदेव‘ नामक ब्राह्मण थे। तुम धर्मपरायण, सत्यवादी और भगवान विष्णु के भक्त थे। तुम्हारी पत्नी गौतमी अत्यंत पतिव्रता और सेवा में तत्पर थी।”
किन्तु तुम दोनों को संतान नहीं थी। इस कारण तुम अत्यंत दुःखी रहते थे। एक दिन तुमने अपनी पत्नी से कहा, ‘पुत्र के बिना जीवन व्यर्थ है।‘
तब तुम्हारी पत्नी गौतमी ने धैर्यपूर्वक समझाया, “हे स्वामी! आप जैसे ज्ञानी को पुत्र की इच्छा नहीं करनी चाहिए। यदि आपको संतान की कामना है, तो भगवान विष्णु की आराधना कीजिए।”
पत्नी के वचन सुनकर तुमने निश्चय किया और दोनों मिलकर ताम्रपर्णी नदी के तट पर जाकर कठोर तपस्या आरम्भ की। तुम पाँच-पाँच दिन में केवल सूखे पत्तों और जल का सेवन करते थे। इस प्रकार चार हजार वर्षों तक कठोर तप करते रहे, जिससे तीनों लोक विचलित हो उठे।
तुम्हारी इस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर तुम्हारे सामने प्रकट हुए। उनका स्वरूप अत्यंत दिव्य और मनोहर था। उन्हें देखकर तुम अत्यंत प्रसन्न हुए और साष्टांग प्रणाम कर उनकी स्तुति करने लगे।
श्रीनारायण बोले, “हे नारद! इस प्रकार उस ब्राह्मण सुदेव की तपस्या और भगवान के प्रति उसकी भक्ति के कारण उसे अगले जन्म में राजा दृढ़धन्वा के रूप में जन्म मिला और उसे यह वैभव प्राप्त हुआ।”
श्रीनारायण बोले, “हे नारद! अब आगे की कथा सुनो। जब भगवान हरि सुदेव ब्राह्मण के सामने प्रकट हुए, तब वह अत्यंत भावविभोर होकर हाथ जोड़ गद्गद वाणी में उनकी स्तुति करने लगा।
वह बोला, “हे देवों के देव! हे त्रैलोक्य के रक्षक! मैं आपकी शरण में आया हूँ। आप ही सबके आधार, सबके पालनकर्ता और दुःखों का नाश करने वाले हैं। मैं दीन, दुःखी और अल्पबुद्धि हूँ, आपकी महिमा का वर्णन करने में असमर्थ हूँ, फिर भी आपकी शरण में आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिए।”
उसकी करुण पुकार और भक्ति से भरे वचन सुनकर भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और गम्भीर स्वर में बोले, “हे वत्स! तुम्हारी तपस्या अत्यंत श्रेष्ठ है। मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम जो चाहो वर माँगो।”
तब सुदेव ने विनम्र भाव से कहा, “हे प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे एक सत्पुत्र प्रदान कीजिए। पुत्र के बिना यह गृहस्थ जीवन मुझे सूना प्रतीत होता है।”
यह सुनकर भगवान हरि कुछ क्षण मौन रहे, फिर बोले, “हे ब्राह्मण! तुम्हारे भाग्य में पुत्र का सुख नहीं लिखा है। मैंने तुम्हारे भविष्य को देखा है। सात जन्मों तक तुम्हें पुत्र प्राप्त नहीं होगा। इसलिए तुम कोई अन्य वर माँगो।”
भगवान के ये कठोर वचन सुनकर सुदेव का हृदय टूट गया। वह ऐसे भूमि पर गिर पड़ा जैसे जड़ कट जाने पर वृक्ष गिर जाता है। उसकी यह दशा देखकर उसकी पत्नी गौतमी अत्यंत व्याकुल हो उठी और विलाप करने लगी।
कुछ समय बाद धैर्य धारण कर गौतमी बोली, “हे स्वामी! उठिए। जो भाग्य में लिखा है वही प्राप्त होता है। मनुष्य अपने कर्मों का फल भोगता है। यदि भाग्य प्रतिकूल हो, तो सारे प्रयास व्यर्थ हो जाते हैं। इसलिए अब दैव को ही स्वीकार कीजिए।”
पत्नी के ये वचन सुनकर भी सुदेव का दुःख कम न हुआ। तभी भगवान के वाहन गरुड़जी यह दृश्य देखकर द्रवित हो उठे। वे भगवान विष्णु से बोले, “हे प्रभो! यह ब्राह्मण और इसकी पत्नी आपके परम भक्त हैं। इनके दुःख को देखकर आपकी करुणा कहाँ चली गई? आपने सदैव अपने भक्तों की रक्षा की है, फिर आज आप इन्हें पुत्र देने में संकोच क्यों कर रहे हैं?
हे नाथ! आपके लिए तो सब कुछ संभव है। जब आपने सुदामा को वैभव दिया और संदीपनी मुनि को उनका मृत पुत्र वापस दिलाया, तो इस ब्राह्मण को पुत्र देना आपके लिए क्या कठिन है?”
गरुड़जी के करुणामय वचन सुनकर भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और बोले, “हे वैनतेय! तुम ठीक कहते हो। यह ब्राह्मण मेरा भक्त है, इसलिए इसे एक पुत्र अवश्य मिलना चाहिए।”
भगवान की आज्ञा पाकर गरुड़जी अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने तुरंत सुदेव को एक सुन्दर और योग्य पुत्र प्रदान किया।
श्रीनारायण बोले, “हे नारद! इस प्रकार भगवान की कृपा और गरुड़जी के अनुरोध से सुदेव को पुत्र प्राप्त हुआ।”
श्रीनारायण बोले, “हे नारद! अब आगे की अद्भुत कथा सुनो, जो महर्षि वाल्मीकि ने राजा दृढ़धन्वा को सुनाई थी।”
गरुड़जी ने भगवान हरि की आज्ञा से सुदेव ब्राह्मण को समझाते हुए कहा, “हे द्विजश्रेष्ठ! यद्यपि तुम्हारे भाग्य में सात जन्मों तक पुत्र का सुख नहीं लिखा है, फिर भी भगवान की कृपा से मैं तुम्हें अपने अंश से एक पुत्र देता हूँ। परंतु ध्यान रहे, यह पुत्र तुम्हें सुख के साथ-साथ दुःख भी देगा।”
गरुड़जी ने आगे कहा, “मनुष्य का जीवन जल के बुलबुले के समान क्षणभंगुर है। इस नश्वर शरीर को पाकर जो व्यक्ति भगवान हरि का स्मरण करता है, वही वास्तव में धन्य है। संसार-सागर से पार लगाने वाले केवल भगवान ही हैं, अतः उनके स्मरण में स्थित रहो।”
इसके पश्चात् भगवान हरि गरुड़ पर आरूढ़ होकर वैकुण्ठ को चले गए और सुदेव अपनी पत्नी गौतमी के साथ प्रसन्न होकर अपने घर लौट आया। कुछ समय बाद गौतमी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया।
उस बालक का नाम शुकदेव रखा गया, क्योंकि वह शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान तेजस्वी और मन को आनन्द देने वाला था। समय के साथ वह बालक बढ़ने लगा और उपनयन संस्कार के बाद वेद-अध्ययन में प्रवृत्त हुआ। उसकी बुद्धि तीव्र थी और उसने शीघ्र ही समस्त विद्या प्राप्त कर ली।
एक दिन महान तेजस्वी देवल ऋषि वहाँ पधारे। सुदेव ने उनका आदर-सत्कार किया। बालक को देखकर देवल ऋषि अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, “हे सुदेव! तुम अत्यंत भाग्यशाली हो। तुम्हारा पुत्र गुणों का भंडार है। बुद्धिमान, विनीत और वेदों का ज्ञाता।”
किन्तु कुछ क्षण बाद देवल ऋषि गंभीर हो गए और बोले, “इस बालक में एक दोष है। इसकी आयु अल्प है। यह बारहवें वर्ष में जल में डूबकर मृत्यु को प्राप्त होगा।”
यह सुनते ही सुदेव और गौतमी शोक से व्याकुल होकर भूमि पर गिर पड़े। सुदेव विलाप करने लगे।
तब धैर्य धारण कर गौतमी ने अपने पति को समझाया, “हे स्वामी! जो होना निश्चित है, उससे भय करना व्यर्थ है। संसार में राजा नल, राम, युधिष्ठिर जैसे महान पुरुषों ने भी दुःख भोगे हैं। इसलिए शोक को त्यागकर भगवान हरि का स्मरण कीजिए, वही हमारे रक्षक हैं।”
पत्नी के इन धैर्यपूर्ण वचनों को सुनकर सुदेव ने अपने मन को स्थिर किया और भगवान के चरणों में ध्यान लगाकर पुत्र-वियोग के भय को त्याग दिया।
नारदजी बोले, “हे प्रभो! आगे उस राजा दृढ़धन्वा का क्या हुआ, कृपा कर वह कथा सुनाइए, जिसका श्रवण पापों का नाश करता है।”
श्रीनारायण बोले, “हे नारद! अपने पूर्वजन्म का अद्भुत चरित्र सुनकर राजा दृढ़धन्वा और अधिक जानने को उत्सुक हुए। तब महर्षि वाल्मीकि ने आगे की कथा कहना आरम्भ किया।”
बाल्मीकि मुनि बोले, “हे राजन्! जब गौतमी के शीतल और धैर्यपूर्ण वचन सुदेव शर्मा ने सुने, तब उन्होंने अपने मन को स्थिर किया और भगवान हरि के स्मरण में लीन होकर अपने कर्तव्यों में लग गए। एक दिन वे समिधा, कुश और पुष्प लेने के लिए वन को गए और वहाँ भी भगवान के चरणों का ध्यान करते रहे।”
उसी समय उनका पुत्र शुकदेव अपने मित्रों के साथ खेलने के लिए एक बावड़ी के पास गया। सभी बालक जल में क्रीड़ा करने लगे। खेलते-खेलते शुकदेव ने अपने साथियों को छकाने के लिए गहरे जल में गोता लगाया, परन्तु दुर्भाग्यवश वह बाहर न आ सका और उसी जल में उसकी मृत्यु हो गई।
जब बालकों ने उसे बाहर आते नहीं देखा, तो वे घबरा गए और दौड़कर उसकी माता गौतमी को यह दुःखद समाचार दिया। यह सुनते ही गौतमी भूमि पर गिर पड़ी। उसी समय सुदेव भी वन से लौटे और पुत्र के निधन का समाचार सुनकर वे भी वज्राघात के समान भूमि पर गिर पड़े।
कुछ समय बाद दोनों पति-पत्नी बावड़ी के पास पहुँचे। वहाँ अपने मृत पुत्र को देखकर वे विलाप करने लगे। सुदेव ने पुत्र को गोद में उठाया, उसके मुख को बार-बार चूमा और रोते हुए करुण वचन कहने लगे, “हे पुत्र! उठो, मुझसे मधुर वचन कहो। हमें छोड़कर कहाँ चले गए? तुम्हारे बिना यह घर शून्य हो गया है। मैं तुम्हारे बिना कहीं नहीं जाऊँगा। तुम्हारी माता रो-रोकर व्याकुल हो रही है, क्या तुम्हें उस पर दया नहीं आती?”
मैंने कौन-सा पाप किया था, जिसके कारण मुझे यह दुःख सहना पड़ा? हे ईश्वर! यह कैसा अन्याय है? संसार में ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ मृत पुत्र पुनः मिल सके।
हे पुत्र! एक बार बोलो, हमें सांत्वना दो। तुम्हारे बिना हमारा जीवन निरर्थक हो गया है।
इस प्रकार सुदेव विलाप करते हुए भगवान को भी पुकारने लगे, “हे गोविन्द! हे विष्णु! हे दीनबंधु! इस पुत्र-वियोग रूपी अग्नि से मुझे बचाइए। मैं अपने ही कर्मों का फल भोग रहा हूँ। मैंने आपके वचनों का उल्लंघन कर पुत्र की इच्छा की, यही मेरे दुःख का कारण है।”
नारदजी बोले, “हे प्रभो! आगे उस राजा दृढ़धन्वा का क्या हुआ? कृपा कर वह पवित्र कथा सुनाइए।”
श्रीनारायण बोले, “हे नारद! अपने पूर्व जन्म का अद्भुत वृत्तांत सुनकर राजा दृढ़धन्वा अत्यंत आश्चर्यचकित हुए और उन्होंने महर्षि वाल्मीकि से आगे की कथा सुनाने का आग्रह किया।”
दृढ़धन्वा बोले, “हे ब्रह्मन्! आपके अमृतमय वचनों को सुनकर भी मेरी तृप्ति नहीं हुई है। कृपा कर आगे की कथा कहिए।”
तब वाल्मीकि मुनि बोले, “हे राजन्! जब सुदेव ब्राह्मण अपने पुत्र शुकदेव के वियोग में विलाप कर रहा था, तभी आकाश में भयंकर गर्जना होने लगी। असमय में मेघ घिर आए, तीव्र वायु चलने लगी और बिजली चमकने लगी। एक मास तक निरंतर वर्षा होती रही, जिससे पृथ्वी जल से भर गई।
परंतु पुत्र-शोक में डूबे सुदेव को कुछ भी ज्ञात नहीं हुआ। न उसने भोजन किया, न जल पिया। वह केवल हे पुत्र! हे पुत्र! कहकर विलाप करता रहा। संयोग से वह पूरा समय पुरुषोत्तम मास था, और अनजाने में ही उसने इस पवित्र मास का व्रत कर लिया।”
उसके इस अनजाने व्रत से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए। उनके दर्शन होते ही मेघ हट गए और वातावरण शांत हो गया। सुदेव ने अपने पुत्र के शरीर को भूमि पर रखकर पत्नी सहित भगवान को दण्डवत प्रणाम किया।
भगवान श्रीहरि मधुर वाणी में बोले, “हे सुदेव! तुम अत्यंत भाग्यशाली हो। तुम्हारा पुत्र अब बारह हजार वर्षों की आयु वाला होगा। तुम्हें उससे पूर्ण सुख प्राप्त होगा। यह सब पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से संभव हुआ है।”
भगवान ने आगे एक प्राचीन कथा सुनाई, “एक समय धनु नामक मुनि ने अमर पुत्र की इच्छा से कठोर तप किया। देवताओं ने वर माँगने को कहा, तो उन्होंने अमर पुत्र माँगा। देवताओं ने असमर्थता जताई, तब उन्होंने पर्वत के समान दीर्घायु पुत्र माँगा। उन्हें वैसा पुत्र मिला, पर वह अहंकारी होकर मुनियों का अपमान करने लगा। अंततः एक ऋषि के शाप से उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार हठपूर्वक माँगी गई वस्तु अंततः दुःख का कारण बनती है।”
भगवान ने सुदेव से कहा, “हे ब्राह्मण! गरुड़ द्वारा दिया गया तुम्हारा पुत्र अब पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से चिरायु हो गया है। तुम इस पुत्र के साथ सुखपूर्वक जीवन बिताओगे, फिर ब्रह्मलोक को प्राप्त होकर पुनः पृथ्वी पर जन्म लेकर दृढ़धन्वा नामक राजा बनोगे।”
तुम्हारी पत्नी गौतमी ही उस जन्म में गुणसुंदरी बनेगी, और तुम्हें चार पुत्र तथा एक कन्या प्राप्त होगी। अंततः जब तुम संसार में मोहग्रस्त हो जाओगे, तब यही पुत्र शुक पक्षी बनकर तुम्हें वैराग्य का उपदेश देगा और तुम ज्ञान प्राप्त कर भगवान के परम धाम को प्राप्त हो जाओगे।
भगवान के यह वचन सुनते ही मृत बालक जीवित हो उठा। माता-पिता अत्यंत हर्षित हो गए और देवताओं ने पुष्प वर्षा की।
तब सुदेव ने विनम्र होकर भगवान से पूछा, “हे प्रभो! आपने पहले कहा था कि मुझे पुत्र प्राप्त नहीं होगा, फिर आज आपने मेरे मृत पुत्र को जीवित कैसे किया?”
इस प्रकार सुदेव के मन में उत्पन्न संदेह को दूर करने के लिए भगवान आगे उपदेश देने लगे।
ऋषियों की सभा में गम्भीर शान्ति छाई हुई थी। सभी मुनि अग्नि के चारों ओर बैठे, सूतजी की ओर एकाग्र दृष्टि से देख रहे थे। उनके हृदय में एक ही जिज्ञासा थी। उस अद्भुत घटना का रहस्य जानना, जिसमें एक मृत बालक पुनः जीवित हो उठा था।
नारद जी ने विनम्रता से कहा, “हे प्रभो! उस तपस्वी ब्राह्मण सुदेव को भगवान विष्णु ने क्या उत्तर दिया? कृपा करके विस्तार से बताइये।”
सूतजी ने मंद मुस्कान के साथ कथा आरम्भ की, “हे मुनियों! जब सुदेव ब्राह्मण ने अपने हृदय की शंका भगवान के सामने रखी, तब भक्तवत्सल भगवान विष्णु अत्यन्त प्रसन्न हुए। उनकी वाणी मेघ के समान गम्भीर और अमृत के समान मधुर थी।
भगवान बोले, “हे द्विजराज! तुम नहीं जानते कि तुमने कितना महान कार्य किया है। यह पुरुषोत्तम मास, जो हमें अत्यन्त प्रिय है, उसी का प्रभाव है। तुम शोक में डूबे हुए थे, परन्तु अनजाने में ही तुमसे इस मास का व्रत और तप हो गया।”
एक महीने तक तुमने अन्न नहीं लिया। यह उपवास बन गया। वर्षा के कारण तुमने दिन में तीन बार स्नान किया, यह पवित्र स्नान बन गया। और शोक में डूबे रहकर तुमने संसार से विरक्ति धारण की, यह महान तप बन गया।
हे ब्राह्मण! इस पुरुषोत्तम मास का प्रभाव इतना महान है कि यदि कोई एक दिन भी इसका व्रत करे, तो उसके अनन्त पाप नष्ट हो जाते हैं। देवताओं ने भी इसके माहात्म्य को तौलने का प्रयास किया, परन्तु सभी साधन इसके सामने हल्के सिद्ध हुए।
भगवान के ये वचन सुनकर सुदेव के हृदय में आश्चर्य और श्रद्धा का समुद्र उमड़ पड़ा। उसे समझ आ गया कि जो कुछ हुआ, वह केवल भगवान की कृपा और पुरुषोत्तम मास की महिमा से ही सम्भव था।
इसके बाद भगवान विष्णु गरुड़ पर आरूढ़ होकर वैकुण्ठ को प्रस्थान कर गये।
सुदेव ब्राह्मण और उसकी पत्नी गौतमी अपने पुत्र शुकदेव को पुनः जीवित देखकर अत्यन्त आनन्दित हुए। उनका घर, जो शोक से भर गया था, अब हर्ष और कृतज्ञता से भर उठा।
सुदेव ने मन ही मन सोचा, “मैं तो अज्ञानवश इस मास का पालन कर बैठा, और इसका इतना महान फल मिला! यह मास सचमुच अद्भुत है।”
तब से वह हर वर्ष श्रद्धा और भक्ति से पुरुषोत्तम मास का पालन करने लगा। जप, तप, हवन और भगवान की पूजा में उसका मन रम गया। उसने कर्मफल की इच्छा त्यागकर केवल भक्ति मार्ग को अपना लिया।
समय बीतता गया। सुदेव और गौतमी ने अपने पुत्र के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया। अंततः, हजारों वर्षों तक धर्मपूर्वक जीवन जीने के बाद, वे दोनों विष्णु लोक को प्राप्त हुए। जहाँ शोक और दुःख का नाम भी नहीं था।
वहाँ दिव्य सुखों का अनुभव करने के पश्चात्, वे पुनः पृथ्वी पर जन्म लेकर राजा दृढ़धन्वा और उनकी रानी गुणसुन्दरी के रूप में प्रकट हुए।
शुकदेव, जो उनका पुत्र था, वह भी पूर्वजन्म के संस्कारों से युक्त होकर शुक पक्षी के रूप में आया और अपने पिता को वैराग्य का उपदेश देकर उनका कल्याण किया।
इस प्रकार, सूतजी ने कथा समाप्त करते हुए कहा, “हे राजन्! यह सब तुम्हारे ही पूर्व जन्म की कथा है। पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से ही तुम्हें यह वैभव, यह राज्य और यह ज्ञान प्राप्त हुआ है।”
सभा में बैठे सभी ऋषि इस अद्भुत कथा को सुनकर भाव-विभोर हो उठे। उनके हृदय में पुरुषोत्तम मास के प्रति अटूट श्रद्धा जाग उठी।
ऋषियों की पवित्र सभा में एक बार फिर गम्भीर वातावरण छा गया। सभी मुनि भगवान नारायण की दिव्य कथाओं में तल्लीन थे, परन्तु उनके मन की जिज्ञासा अभी शान्त नहीं हुई थी।
तभी सूतजी बोले, “हे विप्रों! जब नारद मुनि ने भगवान नारायण के मुख से राजा दृढ़धन्वा के पूर्वजन्म का अद्भुत वृत्तांत सुना, तब भी उनके हृदय को पूर्ण तृप्ति नहीं मिली। वे और अधिक जानने की इच्छा से पुनः प्रश्न करने लगे।”
नारदजी विनम्र होकर बोले, “हे प्रभो! उस समय राजा दृढ़धन्वा ने महर्षि वाल्मीकि से क्या कहा? कृपा करके विस्तार से बताइये।”
भगवान नारायण मुस्कुराए और बोले, “हे नारद! अब तुम ध्यानपूर्वक सुनो। जब राजा दृढ़धन्वा ने अपने पूर्वजन्म का रहस्य जाना, तब उनके हृदय में वैराग्य और जिज्ञासा का उदय हुआ। वे महर्षि वाल्मीकि के चरणों में प्रणाम कर विनीत भाव से बोले, “हे मुनिश्रेष्ठ! मुझे बताइये कि मोक्ष की इच्छा रखने वाले मनुष्य को पुरुषोत्तम मास का व्रत किस प्रकार करना चाहिए? कौन-सा दान देना चाहिए और उसकी विधि क्या है?”
हे प्रभो! यह ज्ञान केवल मेरे लिए ही नहीं, बल्कि समस्त लोकों के कल्याण के लिए आवश्यक है। आपने ही बताया कि यह पुरुषोत्तम मास स्वयं भगवान का स्वरूप है। मैं पूर्वजन्म में सुदेव ब्राह्मण था, और अनजाने में इस मास का पालन किया, जिसके प्रभाव से मेरा मृत पुत्र भी जीवित हो गया।
किन्तु हे मुनिवर! अब इस जन्म में मैं सब कुछ भूल गया हूँ। अतः कृपा करके इसकी सम्पूर्ण विधि पुनः बताइये।
राजा के इन विनीत वचनों को सुनकर महर्षि वाल्मीकि अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने शांत स्वर में विस्तार से पुरुषोत्तम मास की विधि बतानी आरम्भ की, “हे राजन्! इस पवित्र मास में मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त में उठकर सबसे पहले भगवान का स्मरण करना चाहिए। शुद्धता का विशेष ध्यान रखते हुए नित्यकर्म सम्पन्न करे। शौच, स्नान, आचमन और दन्तधावन आदि विधिपूर्वक करें।
स्नान के पश्चात् शुद्ध वस्त्र धारण कर, गोपीचन्दन से तिलक लगाकर, प्राणायाम और संध्या-वंदन करे। फिर एक पवित्र स्थान पर मण्डल बनाकर कलश स्थापित करे और उसमें तीर्थों का आवाहन करे। गंगा, गोदावरी, कावेरी और सरस्वती का स्मरण करे।
इसके बाद श्रद्धा और भक्ति से भगवान पुरुषोत्तम की मूर्ति स्थापित कर, विधिपूर्वक पूजा करे। गन्ध, अक्षत, पुष्प, दीप और नैवेद्य अर्पित करे।
हे राजन्! यह शरीर बहुत दुर्लभ है। धन, घर, पुत्र ये सब बार-बार मिल सकते हैं, परन्तु यह मानव शरीर बार-बार नहीं मिलता। इसलिए इसे धर्म के लिए ही उपयोग करना चाहिए।
यह संसार क्षणभंगुर है। युवावस्था पुष्प के समान शीघ्र मुरझा जाती है, धन जल की तरंग के समान चंचल है और जीवन प्रतिदिन घटता जाता है। इसलिए बुद्धिमान वही है जो समय रहते धर्म का पालन करता है।
जब मन, धन और योग्य पात्र ये तीनों एक साथ मिल जाएँ, तब बिना विलम्ब किये दान और धर्म करना चाहिए।
हे नृपश्रेष्ठ! इस पुरुषोत्तम मास का महत्त्व इतना महान है कि थोड़े से साधन से भी मनुष्य महान पुण्य प्राप्त कर सकता है। केवल स्नान, दान और भगवान विष्णु का स्मरण भी मनुष्य को बड़े-बड़े संकटों से बचा लेता है।
जैसे गंगा सभी नदियों में श्रेष्ठ है, वैसे ही सभी महीनों में पुरुषोत्तम मास सर्वोत्तम है। यह स्वयं भगवान का स्वरूप है। अतः श्रद्धा और भक्ति से इसकी पूजा करनी चाहिए।
भगवान नारायण आगे बोले, “हे नारद! इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि ने राजा दृढ़धन्वा को पुरुषोत्तम मास की सम्पूर्ण विधि और उसका गूढ़ रहस्य समझाया। जो मनुष्य इस संसार रूपी भयंकर सागर से पार होना चाहता है, उसे इस पवित्र मास में भगवान पुरुषोत्तम की भक्ति अवश्य करनी चाहिए।”
सूतजी ने कथा समाप्त करते हुए कहा, “हे मुनियों! इस प्रकार यह पवित्र अध्याय समाप्त होता है। जो श्रद्धा से इसे सुनता या पढ़ता है, वह पापों से मुक्त होकर भगवान के परम धाम को प्राप्त करता है।”