हिंदू धर्म में अधिक मास को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना गया है। यह आत्मशुद्धि, भक्ति, दान और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त करने का दुर्लभ अवसर होता है। वर्ष 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास का विशेष संयोग बन रहा है, जिसे धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जा रहा है।
इस पूरे मास में पूजा-पाठ, जप, तप, व्रत और दान का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस अवधि में श्रीहरि की आराधना करने से अनेक जन्मों के पापों का क्षय होता है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।
हिंदू पंचांग चंद्रमा की गति पर आधारित होता है, जबकि अंग्रेजी कैलेंडर सूर्य की गति के अनुसार चलता है। चंद्र वर्ष लगभग 354 से 355 दिनों का होता है, जबकि सौर वर्ष 365 दिनों का होता है। इस प्रकार दोनों के बीच हर वर्ष लगभग 10 से 11 दिनों का अंतर बन जाता है।
जब यह अंतर लगभग एक महीने के बराबर हो जाता है, तब हर तीसरे वर्ष एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है। इसी अतिरिक्त महीने के कारण पंचांग का संतुलन बना रहता है। धार्मिक दृष्टि से यह मास साधना, भक्ति और दान के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।
द्रिक पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में ज्येष्ठ के साथ अधिक मास का संयोग बन रहा है। इस साल अधिक मास 17 मई से शुरू हो रहा है। जिसका समापन 15 जून को होगा। यह पूरा महीना भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। इस अवधि में जप, तप, व्रत, दान और धार्मिक कार्यों का विशेष महत्व रहता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्रारंभ में इस अतिरिक्त महीने को मल मास कहा जाता था और इसे शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता था। कोई भी देवता इस मास का स्वामी बनने को तैयार नहीं हुआ।
तब यह मास भगवान विष्णु की शरण में पहुंचा। श्रीहरि ने करुणा दिखाते हुए इसे अपना नाम प्रदान किया और कहा कि अब यह पुरुषोत्तम मास कहलाएगा। भगवान विष्णु ने वरदान दिया कि इस मास में जो भी भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ उनकी पूजा करेगा, उसे वर्ष भर की साधना से भी अधिक पुण्य फल प्राप्त होगा।
इसी कारण अधिक मास को भगवान विष्णु की आराधना के लिए समर्पित माना जाता है।
ज्येष्ठ अधिक मास में भगवान विष्णु की पूजा करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और घर में सुख-शांति का वास होता है। प्रतिदिन प्रातः स्नान के बाद श्रीहरि के समक्ष घी का दीपक जलाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप इस मास में विशेष फलदायी माना गया है। इसके साथ ही विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत का पाठ करना भी अत्यंत पुण्यदायी होता है।
मान्यता है कि इस मास में की गई भक्ति सीधे भगवान विष्णु को समर्पित होती है और भक्त को विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।
अधिक मास में दान का अत्यंत महत्व है, क्योंकि इस महीने में किया गया दान, पूजा और तप का फल कई गुना बढ़ जाता है। अधिक मास पर जरूरतमंदों और दीन-हीन, असहाय लोगों को अन्न, भोजन, वस्त्र, दीपक, नारियल और मालपुआ का दान करना चाहिए। इससे जीवन में सुख-समृद्धि, सकारात्मकता और पुण्य की प्राप्ति होतीहै तथा पापों का नाश होता है।
इस पूरे मास में सात्विक जीवन शैली अपनानी चाहिए। नियमित पूजा-पाठ, व्रत और सत्संग में भाग लेना शुभ माना जाता है। इसके अलावा निम्न चीजें करें-
यह मास आत्मिक उन्नति और मन की शांति प्रदान करता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस मास में कुछ कार्य नहीं किए जाते। जिनका सख्ती से पालन करना चाहिए।
ज्येष्ठ अधिक मास 2026 भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का अत्यंत पावन अवसर है। यह मास सांसारिक कार्यों से अधिक आध्यात्मिक साधना, दान और सेवा के लिए समर्पित है। यदि इस अवधि में श्रद्धा, भक्ति और निस्वार्थ सेवा भाव से श्रीहरि की आराधना की जाए, तो जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग खुलता है।
प्रश्न: ज्येष्ठ अधिक मास 2026 कब से कब तक रहेगा?
उत्तर: ज्येष्ठ अधिक मास वर्ष 2026 में 17 मई से 15 जून तक रहेगा। यह अवधि भगवान विष्णु की विशेष आराधना और दान-पुण्य के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है।
प्रश्न: अधिक मास को पुरुषोत्तम मास क्यों कहा जाता है?
उत्तर: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु ने इस अतिरिक्त महीने को अपना नाम प्रदान किया था। इसी कारण इसे पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। मान्यता है कि इस मास में की गई भक्ति का फल कई गुना बढ़ जाता है।
प्रश्न: अधिक मास कितने वर्षों में आता है?
उत्तर: अधिक मास लगभग हर तीसरे वर्ष आता है। यह चंद्र और सौर वर्ष के दिनों के अंतर को संतुलित करने के लिए जोड़ा जाता है।
प्रश्न: अधिक मास में किन भगवान की पूजा करनी चाहिए?
उत्तर: इस मास में मुख्य रूप से भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व होता है।
प्रश्न: अधिक मास में कौन-सा दान सबसे शुभ माना जाता है?
उत्तर: अधिक मास में भोजन दान, अन्न दान, जल दान, वस्त्र दान, गौ सेवा और जरूरतमंदों की सहायता को सबसे शुभ माना जाता है।