सनातन धर्म की दिव्य परंपराओं में पुरुषोत्तम मास का विशेष और अद्वितीय महत्व है। यह मास केवल एक अतिरिक्त कालखंड नहीं, बल्कि भगवान श्रीहरि विष्णु की अनंत कृपा का प्रतीक माना गया है। जब-जब समय के गणना चक्र में असंतुलन उत्पन्न होता है, तब यह पवित्र मास प्रकट होकर धर्म और साधना के मार्ग को सुदृढ़ करता है। आज हम पुरुषोत्तम मास के अध्याय 1 से अध्याय 10 तक की कथा का माहात्म्य जानेंगे।
एक समय की बात है; भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले, वृन्दावन के स्वामी भगवान् पुरुषोत्तम को प्रणाम करते हुए इस पवित्र कथा का आरम्भ होता है। भगवान नारायण, नर-नरोत्तम, देवी सरस्वती और महर्षि व्यास का स्मरण कर यह कथा आगे बढ़ती है।
पवित्र नैमिषारण्य में अनेक महान ऋषि-मुनि एकत्र हुए थे। वे सभी वेदों के ज्ञाता, तपस्वी, ब्रह्मनिष्ठ और परोपकारी थे। उनका उद्देश्य था, यज्ञ के माध्यम से संसार का कल्याण करना और ऐसा ज्ञान प्राप्त करना, जिससे जीवों का उद्धार हो सके। उसी समय सूतजी, जो कि महान कथावाचक और शास्त्रों के मर्मज्ञ थे, तीर्थयात्रा करते हुए वहाँ पहुँचे। उनका स्वरूप अत्यंत दिव्य था। वे शांत, संयमी, भगवान के नाम में लीन और आध्यात्मिक तेज से प्रकाशित थे।
सूतजी को देखकर सभी ऋषि आदरपूर्वक खड़े हो गए। उन्होंने उन्हें उत्तम आसन दिया और विनम्रता से निवेदन किया, “हे सूतजी! आप सब शास्त्रों के ज्ञाता हैं। कृपा करके हमें ऐसी कथा सुनाइए, जो सारभूत हो, कल्याणकारी हो और हमें इस संसार रूपी सागर से पार लगाने वाली हो।” ऋषियों की यह विनती सुनकर सूतजी प्रसन्न हुए और उन्होंने कथा प्रारम्भ की।
सूतजी ने बताया कि वे अनेक पवित्र तीर्थों की यात्रा करते हुए वहाँ पहुँचे हैं। उन्होंने पुष्कर, यमुना, गंगा, काशी, गया, त्रिवेणी, गोदावरी, कावेरी, नर्मदा आदि पवित्र नदियों और स्थानों पर स्नान किया, तर्पण किया और देवताओं-पितरों की पूजा की। इस तीर्थयात्रा ने उनके मन को और अधिक पवित्र और शांत बना दिया।
यात्रा करते-करते वे हस्तिनापुर पहुँचे, जहाँ उन्होंने सुना कि राजा परीक्षित ने अपना राज्य त्याग दिया है और गंगा तट पर तपस्या कर रहे हैं। यह सुनकर सूतजी भी वहाँ पहुँचे। गंगा के किनारे का दृश्य अत्यंत अद्भुत था। अनेक सिद्ध, योगी और ऋषि वहाँ एकत्र थे, जो विभिन्न प्रकार की कठोर तपस्याएँ कर रहे थे। कोई उपवास कर रहा था, कोई केवल वायु पर निर्भर था, तो कोई फलाहार कर जीवन यापन कर रहा था।
उसी समय वहाँ एक महान दिव्य घटना घटी। महर्षि व्यास के पुत्र, ब्रह्मज्ञानी और महान योगी श्री शुकदेव जी वहाँ पधारे। वे युवा थे, परन्तु उनके भीतर अद्भुत वैराग्य और ज्ञान था। उनका स्वरूप अलौकिक था। वे संसार के मोह से पूर्णतः मुक्त और ब्रह्म में लीन थे। उनके आगमन पर सभी ऋषि-मुनि सम्मान में खड़े हो गए और उन्हें एक ऊँचे आसन पर विराजमान किया।
शुकदेव जी उस सभा में ऐसे शोभित हो रहे थे, जैसे आकाश में चन्द्रमा तारों से घिरा हुआ चमकता है। सभी मुनि उनके चारों ओर बैठकर उनके मुख से ज्ञान और भगवान् की कथा सुनने के लिए उत्सुक हो गए।
सूतजी बोले, “हे मुनियों! जब राजा परीक्षित गंगातट पर पहुँचे, तब भगवान शुकदेव जी ने उन्हें श्रीमद्भागवत की अमृतमयी कथा सुनाई। उस कथा को सुनकर राजा परीक्षित को मोक्ष प्राप्त हुआ। उस दिव्य दृश्य को देखकर और वहाँ के पुण्य वातावरण का अनुभव कर मैं यहाँ आप सबके यज्ञ का दर्शन करने आया हूँ। आप जैसे ब्राह्मणों को देखकर मैं स्वयं को धन्य मानता हूँ।”
ऋषियों ने कहा, “हे सूतजी! आपने जो भगवान व्यास के मुख से सुना है, वह अत्यंत अद्भुत और दुर्लभ है। कृपा करके हमें वही कथा सुनाइए, जो जीवन का सार हो, जो मन को शांति दे और जो अमृत से भी बढ़कर हितकारी हो।”
सूतजी विनम्रता से बोले, “मैं तो साधारण हूँ, परन्तु आप महान ऋषि मुझसे प्रश्न कर रहे हैं, यह मेरा सौभाग्य है। जो कुछ मैंने अपने गुरु व्यासजी से सुना है, वही मैं आपको सुनाता हूँ।”
इसके बाद सूतजी ने एक पुरातन प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया, एक बार देवर्षि नारद, बद्रीनाथ के समीप स्थित नर-नारायण के आश्रम में पहुँचे। वह आश्रम अत्यंत पवित्र और दिव्य था। वहाँ अनेक तपस्वी, सिद्ध और देवता निवास करते थे। चारों ओर हरियाली, फल-फूल से लदे वृक्ष, और पवित्र गंगा व अलकनंदा की धारा उस स्थान को और भी सुंदर बना रही थी।
नारद मुनि ने वहाँ पहुँचकर भगवान नारायण को साष्टांग प्रणाम किया। भगवान नारायण गहन तप में लीन थे, उनके तेज से समस्त वातावरण प्रकाशित हो रहा था। उन्हें देखकर नारदजी ने अत्यंत श्रद्धा और प्रेम से उनकी स्तुति की।
नारद जी बोले, “हे देवों के देव! हे जगन्नाथ! आप कृपा के सागर हैं। आपका तप सम्पूर्ण प्राणियों के कल्याण के लिए है। कलियुग में जीव अज्ञान और विषयों में फँसे हुए हैं। ऐसे समय में उनके उद्धार के लिए कोई सरल और प्रभावी उपाय बताइए, जिससे उनका कल्याण हो और उन्हें मोक्ष प्राप्त हो सके। मैं भी आपके मुख से वही ज्ञान सुनना चाहता हूँ।”
नारद जी के मधुर और करुणामय वचनों को सुनकर भगवान नारायण प्रसन्न हुए और बोले, “हे नारद! तुम भगवान की महिमा को जानते हो, फिर भी लोककल्याण के लिए पूछ रहे हो, यह बहुत उत्तम है। मैं तुम्हें एक अत्यंत पुण्यदायक रहस्य बताता हूँ।- यह है पुरुषोत्तम मास का माहात्म्य।”
भगवान नारायण ने कहा, “यह पुरुषोत्तम मास अत्यंत पवित्र है। इसके स्वामी स्वयं भगवान पुरुषोत्तम हैं। इस मास में जो भी भक्त श्रद्धा से व्रत, जप, दान और पूजा करता है, उस पर भगवान अत्यंत प्रसन्न होते हैं और उसे सभी कष्टों से मुक्त कर देते हैं।”
नारद जी ने पुनः प्रश्न किया, “हे प्रभु! अन्य महीनों के देवता तो मैंने सुने हैं, परन्तु पुरुषोत्तम मास का रहस्य क्या है? इसमें क्या करना चाहिए, कौन-से नियम अपनाने चाहिए, और इससे क्या फल प्राप्त होता है। कृपा करके विस्तार से बताइए।
नारद जी ने आगे कहा, “हे प्रभु! इस संसार में अनेक लोग दुखी हैं। कोई दरिद्र है, कोई रोगी, कोई संतानहीन, कोई दुख और शोक से पीड़ित। ऐसे सभी लोगों के कष्ट दूर करने वाला उपाय हमें बताइए।”
सूतजी कहते हैं: नारद जी के इन करुणा से भरे वचनों को सुनकर भगवान नारायण गंभीर और शांत स्वर में आगे की कथा कहने लगे, जिससे समस्त संसार का कल्याण हो सके।
नैमिषारण्य में बैठे ऋषियों ने सूतजी से विनम्रतापूर्वक कहा, “हे महाभाग! भगवान नारायण ने नारद जी से जो शुभ और रहस्यमयी वचन कहे, उन्हें हमें विस्तार से सुनाइए।”
सूतजी बोले, “हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों! मैं वही कथा सुनाता हूँ, जैसी मैंने सुनी है। ध्यानपूर्वक सुनिए।”
भगवान नारायण बोले, “हे नारद! पहले एक पुरातन प्रसंग सुनो, जो स्वयं श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा था। एक समय की बात है। द्यूत क्रीड़ा में छलपूर्वक हारकर युधिष्ठिर और उनके भाई पांडव अपना राज्य खो बैठे। सबके सामने द्रौपदी का अपमान हुआ; दुष्ट दुःशासन ने उसके केश पकड़कर उसे सभा में घसीटा और उसके वस्त्र उतारने का प्रयास किया। उस संकट की घड़ी में भगवान श्रीकृष्ण ने उसकी लाज की रक्षा की।
इसके बाद पांडव वनवास को चले गए और काम्यवन में रहने लगे। वहाँ वे अत्यंत कष्ट में जीवन बिताते थे। कंद-मूल और फल खाकर, धूल से ढके शरीर और बढ़े हुए बालों के साथ वे तपस्वियों की तरह जीवन जी रहे थे। एक दिन भगवान श्रीकृष्ण, मुनियों के साथ उन्हें देखने वहाँ पहुँचे।
भगवान को देखकर पांडव ऐसे प्रसन्न हुए मानो मृत शरीर में प्राण लौट आए हों। उन्होंने प्रेमपूर्वक उनका स्वागत किया और चरणों में प्रणाम किया। द्रौपदी भी अत्यंत विनम्रता से उनके सामने उपस्थित हुई। पांडवों और द्रौपदी की दयनीय अवस्था देखकर भगवान श्रीकृष्ण का हृदय द्रवित हो गया और वे कौरवों पर अत्यंत क्रोधित हो उठे।
उनका क्रोध प्रलय की अग्नि के समान भयंकर था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे सम्पूर्ण संसार को नष्ट कर देंगे। यह देखकर अर्जुन भयभीत हो गए और उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान की स्तुति करते हुए कहा, “हे प्रभु! आप जगत के रक्षक हैं। एक के अपराध के कारण सम्पूर्ण सृष्टि का नाश करना उचित नहीं है। जैसे कोई मच्छरों को मारने के लिए अपना घर नहीं जलाता, वैसे ही आप भी क्रोध को शांत करें।”
अर्जुन के विनम्र वचनों को सुनकर भगवान श्रीकृष्ण शांत हो गए। उनका क्रोध शांत होते ही पांडवों ने राहत की सांस ली और प्रेमपूर्वक उनकी सेवा की। इसके बाद अर्जुन ने भगवान से वही प्रश्न किया, जो आगे नारद जी ने नारायण से पूछा था, “हे प्रभु! ऐसा कौन-सा उपाय है जिससे मनुष्य के सभी दुख दूर हो जाएँ?”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “हे अर्जुन! यह अत्यंत गुप्त और दुर्लभ रहस्य है, जिसे ऋषि-मुनि भी आसानी से नहीं जानते। फिर भी तुम्हारे प्रेम और भक्ति के कारण मैं तुम्हें बताता हूँ।”
उन्होंने आगे समझाया कि इस सृष्टि में हर वस्तु जैसे समय, मास, ऋतु, नदियाँ, पर्वत, वन, औषधियाँ सबके अपने-अपने अधिष्ठाता देवता होते हैं, जिनकी पूजा से फल प्राप्त होता है।
फिर उन्होंने एक अद्भुत कथा सुनाई, एक बार एक ‘अधिक मास‘ उत्पन्न हुआ। लेकिन उसमें सूर्य की संक्रांति नहीं होने के कारण सभी लोगों ने उसे तुच्छ और अशुभ मान लिया। उसे ‘मलमास‘ कहकर अपमानित किया गया। इस तिरस्कार से वह मास अत्यंत दुखी और निराश हो गया।
अंततः वह भगवान विष्णु की शरण में वैकुण्ठ पहुँचा। वहाँ भगवान को दिव्य सिंहासन पर विराजमान देखकर उसने अश्रुपूर्ण नेत्रों से साष्टांग प्रणाम किया और अपने दुख को व्यक्त करने के लिए विनती की।
इतना कहकर बद्रीनाथ थोड़ी देर के लिए मौन हो गए। तब नारद जी ने उत्सुक होकर पूछा, “हे प्रभु! उस अधिक मास ने भगवान के सामने क्या कहा?”
भगवान नारायण, नारद मुनि से बोले, “हे नारद! अब मैं तुम्हें वह करुण कथा सुनाता हूँ, जो अधिक मास ने स्वयं भगवान पुरुषोत्तम के सामने कही थी। यह कथा लोककल्याण करने वाली है, ध्यानपूर्वक सुनो।”
अधिक मास अत्यंत दुखी होकर भगवान के चरणों में गिर पड़ा और करुण स्वर में बोला, “हे प्रभु! हे कृपा के सागर! मुझसे बलवान अन्य महीनों ने मुझे ‘मलमास‘ कहकर तुच्छ ठहरा दिया है। उन्होंने मुझे अपने बीच से निकाल दिया है। मैं अनाथ और स्वामीहीन हो गया हूँ। आप तो दीनों के रक्षक हैं, फिर मेरी रक्षा क्यों नहीं करते?”
वह आगे बोला, “हे नाथ! जैसे आपने संकट में पड़े भक्तों की रक्षा की, वैसे ही मेरी भी रक्षा कीजिए। आपने देवकी की रक्षा की, द्रौपदी की लाज बचाई, कालिय नाग के विष से ग्वालों और गायों को बचाया, जंगल की अग्नि से व्रजवासियों को सुरक्षित किया, जरासंध के बंधन से राजाओं को छुड़ाया और गजराज को ग्राह के मुख से बचाया। तो क्या मैं आपकी शरण में आकर भी अनाथ रह जाऊँ?”
इतना कहकर अधिक मास रोने लगा। उसके नेत्रों से आँसू बहने लगे और वह भगवान के सामने खड़ा-खड़ा अपनी व्यथा में डूब गया।
भगवान विष्णु यह दृश्य देखकर अत्यंत दयालु हो उठे। उन्होंने स्नेहपूर्वक कहा, “हे वत्स! तुम इतने दुखी क्यों हो? तुम्हारे मन में कौन-सा कष्ट है? मेरी शरण में आने वाला कभी शोक में नहीं रहता। यह वैकुण्ठ ऐसा स्थान है जहाँ न दुख है, न बुढ़ापा, न मृत्यु का भय। यहाँ केवल आनंद ही आनंद है। फिर तुम यहाँ आकर भी दुखी क्यों हो?”
भगवान के ये वचन सुनकर अधिक मास ने कुछ धैर्य धारण किया और गहरी साँस लेते हुए बोला, “हे प्रभु! आप सर्वज्ञ हैं, आपसे कुछ भी छिपा नहीं है। फिर भी मैं अपनी व्यथा कहता हूँ। संसार के सभी काल क्षण, मुहूर्त, दिन, रात, पक्ष और अन्य मास सबके अपने-अपने स्वामी हैं, इसलिए वे सम्मानित हैं। परन्तु मेरा कोई नाम नहीं, कोई स्वामी नहीं, कोई स्थान नहीं। इसी कारण सभी मुझे तुच्छ समझते हैं और शुभ कार्यों में मुझे वर्जित कर देते हैं।”
वह और भी दुखी होकर बोला, “लोग मुझे ‘मलमास‘ कहकर अपमानित करते हैं। कहते हैं कि मैं अशुभ हूँ, त्याज्य हूँ, और सभी कार्यों में बाधा डालने वाला हूँ। इस अपमान से मेरा हृदय टूट गया है। अब मुझे जीने की इच्छा नहीं है। ऐसे निंदित जीवन से तो मृत्यु ही श्रेष्ठ है।”
अधिक मास की यह करुण पुकार सुनकर वह बार-बार कहने लगा, “मैं नहीं जीना चाहता, मैं मर जाऊँगा।” ऐसा कहते-कहते वह अचानक भगवान के चरणों में गिर पड़ा। यह देखकर वहाँ उपस्थित सभी देवता और पार्षद आश्चर्यचकित रह गए।
भगवान श्रीहरि का हृदय करुणा से भर गया। वे मेघ के समान गंभीर और चन्द्रमा की किरणों के समान शीतल वाणी में उसे शांत करते हुए बोले, “हे प्रिय! धैर्य रखो, मैं तुम्हारे दुःख का निवारण अवश्य करूँगा।”
सूतजी कहते हैं: हे ब्राह्मणों! भगवान के ये वचन पापरूपी समुद्र को सुखाने वाली अग्नि के समान थे। उन्हें सुनकर नारद मुनि अत्यंत प्रसन्न हुए और आगे की कथा सुनने के लिए उत्सुक हो उठे।
देवर्षि नारद ने भगवान नारायण से जिज्ञासा की, “हे प्रभु! जब अधिक मास ने अपनी करुण व्यथा भगवान के सामने कही, तब भगवान श्रीहरि ने उससे क्या कहा? कृपा करके विस्तार से बताइए।”
भगवान नारायण बोले, “हे नारद! ध्यानपूर्वक सुनो। जब अधिक मास अत्यंत दुखी होकर भगवान के चरणों में गिर पड़ा और मूर्छित हो गया, तब भगवान के संकेत से गरुड़ उसे अपने पंखों से हवा करने लगे। कुछ ही क्षणों में अधिक मास को चेतना आई। वह पुनः विलाप करते हुए बोला, “हे प्रभु! मेरी रक्षा कीजिए, मैं आपकी शरण में आया हूँ। आप मेरी उपेक्षा क्यों कर रहे हैं?”
उसकी करुण पुकार सुनकर भगवान विष्णु दयालु हो उठे। उन्होंने स्नेह से कहा, “हे वत्स! उठो, धैर्य रखो। शोक मत करो। तुम्हारा दुःख अब दूर होगा।” यह कहकर भगवान कुछ क्षण विचार में डूब गए और फिर बोले, “हे प्रिय! अब तुम मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें उस दिव्य लोक में ले चलता हूँ, जहाँ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम निवास करते हैं। वही तुम्हारे दुःख का निवारण करेंगे।”
इसके बाद भगवान विष्णु अधिक मास का हाथ पकड़कर उसे गोलोक ले गए। यह गोलोक अत्यंत दिव्य और अलौकिक स्थान है, जहाँ केवल प्रकाश ही प्रकाश है। जैसे करोड़ों सूर्य एक साथ चमक रहे हों। वह लोक सभी लोकों से श्रेष्ठ, नित्य और परम आनंद से परिपूर्ण है।
गोलोक का वर्णन करते हुए बताया गया कि वहाँ की भूमि रत्नों से बनी हुई है, चारों ओर अद्भुत प्रकाश और सौंदर्य व्याप्त है। वहाँ न कोई रोग है, न शोक, न मृत्यु का भय। सिर्फ शांति और आनंद ही आनंद है। उस दिव्य लोक के नीचे बैकुण्ठ और शिवलोक स्थित हैं, जहाँ भगवान विष्णु और भगवान शिव अपने-अपने भक्तों के साथ निवास करते हैं।
गोलोक के भीतर एक अद्भुत ज्योति विराजमान है, जो परमानंद का स्रोत है। उसी ज्योति के मध्य में भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य स्वरूप प्रकट होता है। उनका रूप अत्यंत मनोहर है: श्याम वर्ण, कमल के समान नेत्र, मधुर मुस्कान, हाथ में मुरली, पीताम्बर धारण किए हुए, वनमाला से सुशोभित। उनके मुख की आभा करोड़ों चन्द्रमाओं के समान शीतल और आकर्षक है।
भगवान श्रीकृष्ण वहाँ रासमण्डल के मध्य विराजमान हैं, चारों ओर गोपियाँ और भक्तगण हैं। वे पूर्ण परब्रह्म, समस्त सृष्टि के आधार और सभी आनंदों के स्रोत हैं। वे भक्तों पर असीम कृपा करने वाले, निःस्पृह, निर्विकार और सर्वशक्तिमान हैं।
भगवान विष्णु अधिक मास को उसी गोलोक में लेकर पहुँचे, ताकि वह स्वयं श्रीकृष्ण के दर्शन कर सके और अपनी पीड़ा से मुक्त हो सके। यह दृश्य अत्यंत दिव्य और अद्भुत था।
सूतजी कहते हैं- इस प्रकार भगवान नारायण ने यह अद्भुत कथा कहकर कुछ समय के लिए मौन धारण किया। यह सुनकर नारद मुनि अत्यंत उत्सुक हो उठे और आगे की कथा जानने के लिए पुनः प्रश्न करने लगे।
देवर्षि नारद ने भगवान नारायण से विनम्रतापूर्वक पूछा, “हे प्रभु! जब भगवान विष्णु अधिक मास को लेकर गोलोक पहुँचे, तब वहाँ क्या हुआ? कृपा करके विस्तार से बताइए।”
भगवान नारायण बोले, “हे नारद! ध्यानपूर्वक सुनो। जब भगवान विष्णु अधिक मास को साथ लेकर गोलोक पहुँचे, तब उन्होंने दूर से ही उस दिव्य धाम को देखा। वह स्थान मणियों के खम्भों से सुशोभित, अद्भुत प्रकाश से भरा हुआ और अलौकिक तेज से युक्त था। उस तेज को देखकर भगवान विष्णु के नेत्र कुछ समय के लिए चकाचौंध हो गए। फिर धीरे-धीरे उन्होंने अपनी आँखें खोलीं और अधिक मास को साथ लेकर आगे बढ़े।”
मंदिर के समीप पहुँचकर द्वारपालों ने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया। भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न होकर भीतर गए और वहाँ रत्नमय सिंहासन पर विराजमान भगवान श्रीकृष्ण को साष्टांग प्रणाम किया। श्रीकृष्ण गोपियों के मध्य रासमण्डल में विराजमान थे: श्यामवर्ण, मुरलीधारी, पीताम्बर धारण किए हुए, अत्यंत मनोहर और दिव्य स्वरूप वाले।
भगवान विष्णु ने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की, “हे गोविन्द! आप गुणों से परे, अविनाशी, अद्वितीय और सम्पूर्ण सृष्टि के आधार हैं। आप रासलीला के स्वामी, भक्तों के प्रिय और परम आनन्द के स्रोत हैं। मैं आपको बारंबार नमस्कार करता हूँ।”
स्तुति के बाद भगवान विष्णु को श्रीकृष्ण की आज्ञा से सिंहासन पर स्थान मिला। फिर उन्होंने काँपते हुए अधिक मास को आगे लाकर श्रीकृष्ण के चरणों में प्रणाम कराया।
तब भगवान श्रीकृष्ण ने आश्चर्य से पूछा, “हे विष्णु! यह कौन है? यह यहाँ क्यों आया है? और यह इतना दुखी क्यों है? गोलोक में तो कोई भी दुखी नहीं होता। यहाँ तो सब आनंद में रहते हैं, फिर यह रो क्यों रहा है?”
तब भगवान विष्णु खड़े होकर विनम्रता से बोले, “हे प्रभु! यह अधिक मास है। इसका कोई स्वामी नहीं है, इसलिए सभी इसे तुच्छ समझते हैं। इसमें सूर्य की संक्रांति नहीं होती, इस कारण इसे अशुभ और ‘मलमास’ कहा जाता है। सभी शुभ कार्यों में इसे वर्जित किया जाता है और इसका अपमान किया जाता है।”
वे आगे बोले, “हे नाथ! अन्य सभी मास, काल, ऋतु और संवत्सर अपने-अपने स्वामियों के कारण सम्मानित हैं, परन्तु यह अकेला और निराश्रित है। इसी कारण यह अत्यंत दुखी होकर मरने तक का विचार कर बैठा था। तब यह मेरी शरण में आया, और मैं इसे आपके पास लेकर आया हूँ। इसका दुःख अत्यंत गहरा है, जिसे केवल आप ही दूर कर सकते हैं।”
भगवान विष्णु ने आगे विनती की, “हे प्रभु! वेदों में कहा गया है कि आप दूसरों के दुःख को सहन नहीं कर सकते। जो आपकी शरण में आता है, वह कभी दुःखी नहीं रहता। इसलिए इस अधिमास पर कृपा कर इसका दुःख दूर कीजिए। मेरा यहाँ आना तभी सफल होगा।”
इतना कहकर भगवान विष्णु हाथ जोड़कर श्रीकृष्ण के सामने खड़े हो गए और उनके उत्तर की प्रतीक्षा करने लगे।
यह सब सुनकर मुनिगण अत्यंत उत्सुक हो उठे। उन्होंने कहा—”हे सूतजी! आप हमें आगे की कथा सुनाइए। भगवान श्रीकृष्ण ने इस पर क्या उत्तर दिया? उन्होंने अधिक मास के साथ क्या किया?”
नैमिषारण्य में बैठे ऋषियों ने जब सूतजी से पूछा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अधिक मास के दुःख को सुनकर क्या किया, तब सूतजी ने सातवें अध्याय की यह दिव्य कथा सुनाई।
सूतजी बोले, “हे मुनियों! यही प्रश्न नारद जी ने भी भगवान नारायण से किया था, और अब मैं वही उत्तर आपको सुनाता हूँ।”
भगवान नारायण बोले, “हे नारद! जब भगवान विष्णु ने अधिक मास की पीड़ा श्रीकृष्ण के सामने रखी, तब गोलोकनाथ श्रीकृष्ण ने अत्यंत करुणा और प्रसन्नता से कहा, “हे विष्णु! तुमने बहुत अच्छा किया जो इस मलमास को यहाँ ले आए। अब इसका उद्धार निश्चित है।”
भगवान श्रीकृष्ण ने आगे कहा, “जिसे तुमने स्वीकार किया है, उसे मैंने भी स्वीकार किया। आज से मैं इसे अपने समान महान बना देता हूँ। मेरे जितने भी गुण, यश, ऐश्वर्य और महिमा हैं, वे सब मैं इसे प्रदान करता हूँ। अब से यह ‘मलमास’ नहीं, बल्कि ‘पुरुषोत्तम मास’ के नाम से प्रसिद्ध होगा।”
उन्होंने घोषणा की, “आज से मैं स्वयं इसका स्वामी हूँ। यह सभी महीनों में श्रेष्ठ और पूजनीय होगा। जो भी श्रद्धा से इस मास में व्रत, जप, दान और पूजा करेगा, उसके सभी दुःख, पाप और दरिद्रता नष्ट हो जाएँगे।”
भगवान ने आगे इसकी महिमा बताते हुए कहा, “अन्य मासों में किए गए पुण्य सीमित फल देते हैं, परंतु इस पुरुषोत्तम मास में किया गया एक छोटा-सा पुण्य भी करोड़ों गुना फल देता है। जो मनुष्य इस मास में भक्ति करता है, वह बिना कठिन तपस्या के ही मेरे परम धाम को प्राप्त कर सकता है।”
उन्होंने यह भी कहा, “जो लोग इस मास का अनादर करते हैं, धर्म-कर्म नहीं करते, स्नान, दान और जप से दूर रहते हैं, वे दुर्भाग्यशाली होते हैं और उन्हें जीवन में दुःख ही मिलता है। परन्तु जो श्रद्धा और विश्वास से इस मास का पालन करते हैं, उन्हें धन, संतान, सुख और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।”
भगवान श्रीकृष्ण ने विशेष रूप से कहा, “मेरे इस पुरुषोत्तम मास के भक्त मुझे अत्यंत प्रिय हैं। उनके छोटे-से प्रयास पर भी मैं प्रसन्न हो जाता हूँ और उनकी मनोकामनाएँ शीघ्र पूरी करता हूँ। उनके दोषों को भी मैं नहीं देखता।”
उन्होंने आगे निर्देश दिया, “जब भी यह पुरुषोत्तम मास आए, तब सभी को अपनी शक्ति के अनुसार स्नान, पूजा, जप और दान अवश्य करना चाहिए। यही सबसे श्रेष्ठ साधन है और यही जीवन को सफल बनाने का सरल मार्ग है।”
अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने विष्णु से कहा, “अब आप इस पुरुषोत्तम मास को साथ लेकर वैकुण्ठ लौट जाओ और इसे जगत में स्थापित करो, ताकि सभी लोग इसका पालन करें और इसका लाभ प्राप्त करें।”
भगवान श्रीकृष्ण के ये वचन सुनकर भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने श्रीकृष्ण को प्रणाम किया और अधिक मास, जो अब पुरुषोत्तम मास बन चुका था, को साथ लेकर गरुड़ पर सवार होकर वैकुण्ठ लौट गए।
नैमिषारण्य में बैठे सूतजी से ऋषियों ने प्रश्न किया कि जब भगवान विष्णु अधिक मास को लेकर वैकुण्ठ लौट गए, तब आगे क्या हुआ?” इस प्रश्न पर सूतजी ने पुरुषोत्तम मास माहात्म्य के आठवें अध्याय की कथा सुनाई।
सूतजी बोले, “हे मुनियों! यही प्रश्न नारद जी ने भी भगवान नारायण से किया था?”
तब भगवान नारायण ने उत्तर दिया, “हे नारद! विष्णुजी अधिक मास को अपने साथ वैकुण्ठ ले गए और वहाँ उसे अपने समीप स्थान दिया। अब वह अधिक मास, जो पहले अपमानित था, बारहों महीनों में श्रेष्ठ बन गया और ‘पुरुषोत्तम मास’ के रूप में प्रतिष्ठित होकर सम्मानित होने लगा।”
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों की ओर देखकर उनसे कहा, “हे युधिष्ठिर! ऐसा प्रतीत होता है कि वनवास के समय आप लोगों ने पुरुषोत्तम मास का आदर नहीं किया, इसी कारण आप इतने दुःखों को भोग रहे हैं। भय, शोक और विपत्तियों में फँसे रहने के कारण आपने इस पवित्र मास का महत्व नहीं समझा।”
भगवान ने आगे समझाया, “मनुष्य को अपने भाग्य पर विश्वास रखना चाहिए, क्योंकि सुख-दुःख, लाभ-हानि सब उसी के अनुसार प्राप्त होते हैं। परन्तु एक और कारण भी है, जिसके कारण तुम्हें यह कष्ट सहना पड़ रहा है। अब मैं वह पुरातन कथा सुनाता हूँ।”
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण द्रौपदी के पूर्व जन्म की कथा सुनाते हैं।
उन्होंने कहा, “पूर्व जन्म में द्रौपदी एक महात्मा ‘मेधावी ऋषि’ की अत्यंत सुन्दर और गुणवान पुत्री थी। वह रूप, विद्या और नीति में निपुण थी और अपने पिता की अत्यंत प्रिय थी। किंतु उसके मन में एक ही चिंता थी। उसे योग्य पति और संतान-सुख कैसे प्राप्त होगा।”
समय बीतता गया, परन्तु उसका विवाह नहीं हो सका। वह अपनी सखियों को पति और परिवार का सुख भोगते देख स्वयं भी उस सुख की कामना करने लगी। वह चिंतित रहने लगी कि कौन-सा उपाय, कौन-सी उपासना या कौन-सा पुण्य कार्य उसे यह सुख दिला सकता है।
उधर उसके पिता मेधावी ऋषि भी उसके योग्य वर की खोज में देश-देशांतर भटकते रहे, परन्तु उन्हें कोई योग्य वर नहीं मिला। इस कारण वे अत्यंत चिंतित और निराश हो गए। इसी चिंता और भाग्य के प्रबल प्रभाव से वे गंभीर रोग से ग्रस्त हो गए और अंततः उनका देहांत हो गया।
मृत्यु के समय उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया, जिससे भगवान के दूत उन्हें अपने साथ दिव्य लोक में ले गए।
अपने पिता की मृत्यु देखकर वह कन्या अत्यंत दुःखी हो गई। वह विलाप करने लगी, “हे पिताजी! अब मैं अनाथ हो गई हूँ। मेरी रक्षा कौन करेगा? मेरा पालन-पोषण कौन करेगा?” वह अपने पिता के शरीर को गोद में लेकर रोती रही।
उसका करुण विलाप सुनकर आसपास के मुनि वहाँ आए और उन्होंने विधिपूर्वक मेधावी ऋषि का अंतिम संस्कार किया। फिर वे कन्या को समझाकर अपने-अपने आश्रम लौट गए।
अब वह कन्या अकेली, दुःख से व्याकुल होकर उसी वन में रहने लगी। पिता के वियोग का दुःख उसे भीतर ही भीतर जलाता रहा। वह न तो ठीक से खा पाती थी, न ही शांत रह पाती थी। जैसे बछड़े के वियोग में गाय व्याकुल हो जाती है, वैसे ही वह भी शोक में डूबी रहती थी।
इस प्रकार आठवें अध्याय में द्रौपदी के पूर्व जन्म की करुण कथा का आरम्भ होता है, जिससे यह समझ आता है कि उसके वर्तमान जीवन के दुःखों का संबंध उसके पूर्व जन्म के कर्मों से है। यह कथा आगे बताती है कि कैसे पुरुषोत्तम मास का पालन जीवन के दुःखों को दूर करने का उपाय बनता है।
सूतजी बताते हैं कि मेधावी ऋषि की कन्या, अपने पिता के निधन के बाद अत्यंत दुःख और अकेलेपन में जीवन व्यतीत कर रही थी। उसका हृदय शोक से भरा हुआ था। वह न केवल माता-पिता से विहीन थी, बल्कि अपने भविष्य को लेकर भी चिंतित थी।
वह कन्या एक सूनी हिरणी की तरह भयभीत और असहाय होकर अपने घर में रहती थी। उसके नेत्र आँसुओं से भरे रहते, हृदय दुःख की अग्नि में जलता रहता, और हर क्षण वह अपने जीवन का कोई मार्ग नहीं देख पाती थी। उसके मन में सबसे बड़ा दुःख यह था कि उसका विवाह नहीं हुआ था और अब उसके जीवन का क्या होगा। यह चिंता उसे भीतर से तोड़ रही थी।
उसी समय, उसके दुःख को दूर करने के लिए दिव्य संयोग से महान तपस्वी दुर्वासा ऋषि वहाँ पधारे। वे अत्यंत तेजस्वी, क्रोधी किन्तु कृपालु मुनि थे, जिनकी महिमा स्वयं देवताओं तक में प्रसिद्ध थी। उन्हें देखकर कन्या के मन में आशा की किरण जागी।
कन्या ने अत्यंत श्रद्धा और विनम्रता से दुर्वासा ऋषि का स्वागत किया। अर्घ्य, पाद्य और वन में उपलब्ध फल-फूल से उनकी पूजा की। उसने उन्हें प्रणाम करते हुए कहा कि आज उसका जीवन धन्य हो गया, क्योंकि एक महान संत उसके द्वार पर आए हैं। उसने यह भी कहा कि शायद उसके पिता के पुण्यों के कारण ही यह सौभाग्य उसे प्राप्त हुआ है।
दुर्वासा ऋषि उसके सेवा-भाव और विनम्रता से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा कि वह एक श्रेष्ठ कुल की, धर्मपरायण और पुण्यात्मा कन्या है। उसके पिता का तप सफल हुआ है, जो उसे ऐसी कन्या प्राप्त हुई।
तब कन्या ने अपने हृदय का सारा दुःख उनके सामने प्रकट किया। उसने कहा कि वह अनाथ है, उसका कोई सहारा नहीं है, और विवाह न होने के कारण उसका जीवन अधूरा रह गया है। उसे यह भय सता रहा था कि यदि शीघ्र विवाह न हुआ तो उसका जीवन व्यर्थ हो जाएगा।
उसकी करुण वाणी सुनकर दुर्वासा ऋषि का हृदय द्रवित हो गया। यद्यपि वे स्वभाव से क्रोधी थे, परन्तु भीतर से अत्यंत दयालु थे। उन्होंने कन्या के दुःख को समझा और उसके कल्याण के लिए उपाय सोचने लगे।
अंततः उन्होंने उसे एक ऐसा दिव्य और सारभूत उपाय बताने का निश्चय किया, जिससे उसके जीवन का दुःख दूर हो सके और उसका भविष्य उज्ज्वल बन सके।
जब उस दुखी कन्या ने महर्षि दुर्वासा ऋषि के सामने अपना दुःख प्रकट किया, तब दयालु मुनि ने उसके कल्याण के लिए एक अत्यंत गुप्त और महान उपाय बताया। उन्होंने कहा कि शीघ्र ही आने वाला पुरुषोत्तम मास सभी मासों में श्रेष्ठ है और इसमें किया गया स्नान, दान, जप और भगवान की पूजा असंख्य गुना फल देने वाली होती है।
उन्होंने समझाया कि इस पवित्र मास में केवल एक बार तीर्थ स्नान करने से भी उतना ही पुण्य प्राप्त होता है, जितना हजारों वर्षों तक तप और गंगास्नान करने से मिलता है। यह मास स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय है, और इसमें की गई भक्ति से मनुष्य की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
दुर्वासा ऋषि ने अपने जीवन का एक प्रसंग भी बताया कि किस प्रकार उन्होंने क्रोध में राजा अम्बरीष को नष्ट करने का प्रयास किया था, लेकिन भगवान के सुदर्शन चक्र से स्वयं संकट में पड़ गए। तब इस पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से ही वे उस भयंकर संकट से बच सके। इस प्रकार उन्होंने कन्या को दृढ़ता से इस मास का व्रत करने का उपदेश दिया।
लेकिन उस कन्या ने मुनि के वचनों को स्वीकार नहीं किया। उसने तर्क करते हुए कहा कि अन्य मास जैसे कार्तिक, वैशाख आदि भी तो महान हैं, फिर यह ‘मलमास’ कैसे श्रेष्ठ हो सकता है? उसने इस मास की महिमा को समझने के बजाय उसका तिरस्कार किया।
यह सुनकर दुर्वासा ऋषि अत्यंत क्रोधित हुए, उनके नेत्र लाल हो उठे, परंतु करुणा के कारण उन्होंने उसे श्राप नहीं दिया। उन्होंने सोचा कि यह कन्या अज्ञानवश ऐसा कह रही है और अभी इसके पास सही समझ नहीं है। इसलिए उन्होंने केवल इतना कहा कि पुरुषोत्तम मास का अनादर करने का फल उसे अवश्य भोगना पड़ेगा, चाहे इस जन्म में या अगले जन्म में।
इसके बाद दुर्वासा ऋषि वहाँ से चले गए। उनके जाने के बाद कन्या का तेज और सौभाग्य क्षीण होने लगा। तब उसे अपने निर्णय पर विचार आया, लेकिन अब वह अलग मार्ग चुन चुकी थी।
अंततः उसने निश्चय किया कि वह भगवान शिव की कठोर तपस्या करेगी, क्योंकि उसे लगा कि वही उसके दुःखों का निवारण कर सकते हैं। इस प्रकार वह पुरुषोत्तम मास की महिमा को त्यागकर, अपने ही मार्ग पर चल पड़ी।