सनातन धर्म में पूर्णिमा तिथि को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना गया है। यह दिन भगवान श्रीहरि विष्णु और माँ लक्ष्मी की आराधना के लिए विशेष फलदायी होता है। जब यह पूर्णिमा पुरुषोत्तम मास अर्थात अधिक मास में आती है, तब इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
लगभग तीन वर्षों में एक बार आने वाला यह दुर्लभ संयोग साधना, भक्ति, दान-पुण्य और आध्यात्मिक उन्नति का अनुपम अवसर प्रदान करता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से किया गया स्नान, जप-तप, पूजा और दान विशेष पुण्य प्रदान करता है तथा जीवन के अनेक कष्टों को दूर करता है। स्कंद पुराण, विष्णुधर्मोत्तर पुराण और भविष्य पुराण में अधिक पूर्णिमा के महत्व का विशेष वर्णन मिलता है।
वैदिक पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ अधिक मास की पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ 30 मई 2026 को सुबह 11 बजकर 57 मिनट पर होगा तथा इसका समापन 31 मई 2026 को दोपहर 2 बजकर 14 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा 31 मई 2026, रविवार को मनाई जाएगी।
यह पूर्णिमा “पुरुषोत्तम पूर्णिमा” के नाम से भी जानी जाती है, क्योंकि यह पुरुषोत्तम मास में पड़ती है। इस दिन भगवान विष्णु की आराधना विशेष शुभ मानी गई है।
पुरुषोत्तम मास स्वयं भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित माना गया है। इस मास में आने वाली पूर्णिमा साधारण पूर्णिमा की तुलना में कहीं अधिक पुण्यफल प्रदान करने वाली मानी जाती है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन किया गया हर शुभ कर्म विशेष पुण्य फल देता है।
मान्यता है कि इस पावन तिथि पर गंगा स्नान, भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की पूजा, व्रत, दान और भक्ति करने से व्यक्ति के समस्त पाप नष्ट होते हैं तथा उसे सुख, समृद्धि और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।
पूर्णिमा का संबंध चंद्रमा से माना गया है और चंद्रमा मन का कारक होता है। इसलिए इस दिन व्रत और पूजा करने से मन की अशांति दूर होती है, सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है तथा आध्यात्मिक चेतना का विकास होता है।
धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि अधिक मास की पूर्णिमा पर भगवान विष्णु का पूजन कई यज्ञों के समान पुण्य प्रदान करता है। इस दिन श्रद्धा से किया गया जप-तप और दान व्यक्ति को पापों से मुक्त कर मोक्ष के मार्ग की ओर अग्रसर करता है।
ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा का व्रत सुख-सौभाग्य और समृद्धि प्रदान करने वाला माना गया है। इस दिन भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की आराधना करने से घर में धन-धान्य, सुख-वैभव और ऐश्वर्य का वास होता है।
ऐसी मान्यता है कि यदि अविवाहित कन्याएं यह व्रत श्रद्धा से करें तो उन्हें योग्य वर की प्राप्ति होती है और यदि युवक यह व्रत करें तो उन्हें सुशील एवं संस्कारी जीवनसाथी प्राप्त होता है।
यह दिन मानसिक शांति, पारिवारिक सुख और सकारात्मक विचारों के लिए भी अत्यंत शुभ माना गया है। ध्यान और भक्ति करने से मन निर्मल होता है तथा जीवन में आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
हिन्दू धर्म के विभिन्न ग्रंथों में दान के महत्व का उल्लेख मिलता है। है। दान का उल्लेख करते हुए शास्त्रों में कहा गया है-
सुक्षेत्रे वापयेद्बीजं सुपात्रे निक्षिपेद्धनम्।
सुक्षेत्रे च सुपात्रे च ह्युप्तं दत्तं न नश्यति॥
अर्थात् अच्छे खेत में बीज बोना चाहिए और योग्य को धन देना चाहिए। अच्छे खेत में बोया गया बीज और पात्र व्यक्ति को दिया गया दान कभी व्यर्थ नहीं जाता।
विष्णुधर्मोत्तर पुराण के अनुसार पुरुषोत्तम मास में पेड़-पौधे लगाने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है। इसलिए अधिक पूर्णिमा पर पीपल, वट, गूलर, तुलसी, आंवला, बेल, अशोक और कदंब जैसे पवित्र वृक्ष लगाने का विशेष महत्व बताया गया है।
इन वृक्षों को भगवान विष्णु का स्वरूप माना गया है। इनके रोपण और संरक्षण से पर्यावरण की रक्षा के साथ-साथ आध्यात्मिक पुण्य की भी प्राप्ति होती है।
पूर्णिमा के दिन तामसिक भोजन से दूर रहें और सात्विकता अपनाएं। किसी से विवाद या कटु वचन न बोलें। मन में सकारात्मक विचार रखें और अधिक से अधिक समय भगवान के स्मरण और भजन-कीर्तन में व्यतीत करें। घर और मंदिर की स्वच्छता बनाए रखें तथा जरूरतमंद लोगों की सहायता अवश्य करें।
पूर्णिमा का यह पवित्र अवसर मानव सेवा और करुणा का संदेश देता है। सनातन परंपरा में हमें बताया गया है कि भूखे को भोजन कराना, असहाय को सहारा देना और जरूरतमंदों की सहायता करना ही सच्चा धर्म है।
ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा के इस पुण्यकारी अवसर पर नारायण सेवा संस्थान के दीन-हीन, असहाय और दिव्यांग बच्चों को भोजन कराने के सेवा प्रकल्प में सहयोग करें और भगवान श्रीहरि की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करें।
प्रश्न: ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा कब मनाई जाएगी?
उत्तर: ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा 31 मई 2026, रविवार को मनाई जाएगी। पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ 30 मई को सुबह 11:57 बजे से होगा और समापन 31 मई को दोपहर 2:14 बजे पर होगा।
प्रश्न: अधिक पूर्णिमा को पुरुषोत्तम पूर्णिमा क्यों कहा जाता है?
उत्तर: जब पूर्णिमा पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) में आती है, तब उसे पुरुषोत्तम पूर्णिमा कहा जाता है। यह संयोग लगभग तीन वर्ष में एक बार बनता है।
प्रश्न: अधिक पूर्णिमा पर किस भगवान की पूजा की जाती है?
उत्तर: इस दिन मुख्य रूप से भगवान श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है।
प्रश्न: क्या अधिक पूर्णिमा पर व्रत रखना चाहिए?
उत्तर: हाँ, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिक पूर्णिमा का व्रत रखने से मानसिक शांति, सुख-सौभाग्य और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।