15 September 2026

पितृ पक्ष में पितरों का तर्पण कैसे करें? जानें तर्पण की विधि, सामग्री और धार्मिक महत्व

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मनुष्य के जीवन को केवल उसके वर्तमान कर्मों से नहीं, बल्कि पूर्वजों के संस्कारों और आशीर्वाद से भी जुड़ा हुआ माना गया है। हमारे पितरों ने अपने जीवन, तप, संस्कार और सत्कर्मों से जिस परिवार की नींव रखी, उनके प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का पावन अवसर है पितृ पक्ष

पितृ पक्ष का समय अपने दिवंगत पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करने, उनके निमित्त तर्पण और श्राद्ध करने तथा दान-पुण्य के माध्यम से अपनी कृतज्ञता अर्पित करने का अवसर प्रदान करता है। सनातन परंपरा में पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मों को अत्यंत श्रद्धा और विधि-विधान से करने की परंपरा रही है।

 

सनातन परंपरा के उपनिषदों में देव और पितृ कर्मों की उपेक्षा न करने का निर्देश मिलता है। धर्म ग्रंथ में कहा गया है-

देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्।
मातृदेवो भव। पितृदेवो भव।
आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव॥

-तैत्तिरीय उपनिषद्, शिक्षावल्ली 1.11.2

अर्थात् देवताओं और पितरों से संबंधित कर्तव्यों में प्रमाद नहीं करना चाहिए। माता, पिता, आचार्य और अतिथि के प्रति देवतुल्य श्रद्धा का भाव रखना चाहिए। यह वचन पितरों के प्रति सम्मान और कर्तव्य की सनातन भावना को स्पष्ट करता है।

 

पितृ पक्ष में तर्पण का महत्व

तर्पण‘ का अर्थ है तृप्त करना। पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करने की परंपरा को तर्पण कहा जाता है। जल में काले तिल और कुशा आदि रखकर पितरों का स्मरण करते हुए अंजलि अर्पित की जाती है।

तर्पण करते समय केवल बाहरी विधि ही नहीं, बल्कि अंतःकरण की श्रद्धा भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। पितरों के नाम और गोत्र का स्मरण करते हुए जब संतान अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करती है, तब यह कर्म श्रद्धा और स्मरण का पावन रूप बन जाता है। 

पितृ पक्ष हमें स्मरण कराता है कि हमारा जीवन अनेक पूर्वजों के त्याग, संस्कार और सत्कर्मों की परंपरा से आगे बढ़ा है। इसलिए इन दिनों पितरों का स्मरण कर उनके प्रति श्रद्धा अर्पित करना सनातन जीवन-पद्धति का महत्वपूर्ण अंग है।

 

पितृ तर्पण के लिए आवश्यक सामग्री

तर्पण की सामग्री में मुख्य रूप से शुद्ध जल या गंगाजल, काले तिल, कुशा, जौ, अक्षत, पुष्प, चंदन और पवित्र पात्र का उपयोग किया जाता है। तर्पण के लिए तांबे, कांसे या चांदी के पात्र का प्रयोग करने की परंपरा है। पितृ कर्म में कुशा का विशेष महत्व माना गया है। इसलिए अपनी कुल-परंपरा के अनुसार कुशा धारण करके तर्पण करना चाहिए।

यह भी स्मरण रखें कि अलग-अलग कुल और क्षेत्र में पितृ कर्म की विधियों में कुछ भिन्नताएं हो सकती हैं। इसलिए अपने कुलाचार और योग्य आचार्य के निर्देश को प्रधानता देना श्रेष्ठ है।

 

पितृ तर्पण कब करें?

पितृ पक्ष के दौरान अपने पितरों की निर्धारित श्राद्ध तिथि पर तर्पण और श्राद्ध कर्म किया जाता है। यदि किसी पितर की श्राद्ध तिथि ज्ञात न हो अथवा किसी कारण से उस दिन श्राद्ध कर्म न हो सके, तो सर्व पितृ अमावस्या को उनके निमित्त श्रद्धापूर्वक तर्पण और दान किया जा सकता है।

तर्पण कुतुप वेला में करना चाहिए जो मध्यान्ह का समय होता है। साथ ही इस कर्म में अपनी कुल-परंपरा के अनुसार निर्धारित काल का पालन करना भी उचित रहता है। पितृ कर्म की सटीक तिथि और मुहूर्त को लेकर संदेह हो तो विद्वान आचार्य से मार्गदर्शन लेना उचित है।

 

पितरों का तर्पण कैसे करें?

  • सबसे पहले प्रातः स्नान करके शरीर और मन की शुद्धि करें। स्वच्छ एवं सफेद वस्त्र धारण करें। पूजा और तर्पण के स्थान को पवित्र करें तथा भगवान श्रीहरि, अपने इष्टदेव और पितरों का स्मरण करें।
  • इसके बाद अपने नाम, गोत्र और पितरों का स्मरण करते हुए संकल्प लें। संकल्प में जिन पितरों के निमित्त तर्पण किया जा रहा है, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए हाथ जोड़कर कहें, “मैं आज (माता का नाम) नामक माता तथा (पिता का नाम) नामक पिता का (स्वयं का नाम) नामक पुत्र अपने समस्त कुल गोत्र के पितरों की प्रसन्नता एवं आशीर्वाद प्राप्ति हेतु तथा धर्म अर्थ काम मोक्ष रूपी पुरुषार्थ की प्राप्ति हेतु अपने घर में पितृ तर्पण करने का संकल्प लेता हूँ।”
  • पितृ तर्पण के लिए दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठने की परंपरा है। जनेऊ धारण करने वाले व्यक्ति पितृ कर्म के विधान के अनुसार उसे अपसव्य करें।
  • अब एक पवित्र पात्र में शुद्ध जल लें। उसमें काले तिल और कुशा रखें। अपने पितरों का नाम और गोत्र स्मरण करते हुए श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करें।
  • तर्पण के समय पितृ मंत्र का स्मरण किया जा सकता है- ॐ पितृभ्यो नमः।
  • जल अर्पित करते हुए अपने पितरों से परिवार पर कृपा बनाए रखने, सद्बुद्धि प्रदान करने और धर्म के मार्ग पर चलने की शक्ति देने की प्रार्थना करें।
  • तर्पण की संख्या, अंजलि देने की विधि और अन्य कर्म अपनी कुल-परंपरा के अनुसार करें। यदि तर्पण की विधि का पूर्ण ज्ञान न हो तो योग्य आचार्य के मार्गदर्शन में यह पवित्र कर्म करना श्रेष्ठ है।

 

तर्पण के बाद दान और सेवा

पितृ पक्ष में तर्पण के साथ दान और सेवा को भी विशेष महत्व है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, फल, दक्षिणा और आवश्यक सामग्री का दान करें। ब्राह्मणों, जरूरतमंदों और असहाय लोगों को भोजन कराएं। 

गौ-सेवा करें, विद्या के लिए सहयोग दें और किसी जरूरतमंद परिवार की सहायता करें। पितरों की स्मृति में किया गया सेवा कर्म हमारी श्रद्धा को लोकमंगल से जोड़ता है।

 

उपनिषदों में दान के विषय में भी श्रद्धा को प्रधानता दी गई है-

श्रद्धया देयम्। अश्रद्धया अदेयम्।

श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्।

भिया देयम्। संविदा देयम्॥

-तैत्तिरीय उपनिषद्, शिक्षावल्ली 1.11.3

अर्थात् दान श्रद्धा से देना चाहिए, बिना श्रद्धा के नहीं। सामर्थ्य के अनुसार उदारता, विनम्रता और उचित भावना के साथ दान करना चाहिए।

इसलिए पितृ पक्ष में किया गया दान केवल किसी वस्तु का त्याग नहीं, बल्कि श्रद्धा, सेवा और कृतज्ञता का पवित्र संकल्प है।

 

पितृ पक्ष में रखें सात्विक आचरण

पितृ पक्ष के दौरान मन, वचन और कर्म की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें। सात्विक भोजन ग्रहण करें और अपनी कुल-परंपरा में निषिद्ध माने गए आहार से दूर रहें। क्रोध, अहंकार, कटु वचन और अनावश्यक विवाद से बचें। 

किसी का अपमान न करें और अपने व्यवहार में दया, संयम तथा विनम्रता रखें। इन दिनों भगवान का स्मरण, पितरों का ध्यान और सेवा कार्य जीवन में श्रद्धा का भाव और अधिक गहरा करते हैं।

 

पितरों का स्मरण ही कृतज्ञता का संस्कार है

पितृ पक्ष हमें अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर देता है। हमारे पूर्वज आज हमारे बीच भौतिक रूप से उपस्थित न हों, फिर भी उनके संस्कार, शिक्षाएं और जीवन-मूल्य हमारे जीवन में विद्यमान रहते हैं। इसलिए पितृ पक्ष में केवल तर्पण की विधि पूरी करना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि पितरों के सद्गुणों को अपने जीवन में उतारना भी उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

उनके नाम पर किसी जरूरतमंद को भोजन कराएं। किसी असहाय की सहायता करें। धर्म और सेवा के मार्ग पर चलें। अपने परिवार में संस्कारों को आगे बढ़ाएं। यही पितृ स्मरण को सार्थक बनाता है। सनातन धर्म हमें सिखाता है कि देवताओं और पितरों से जुड़े कर्तव्यों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

तैत्तिरीय उपनिषद् का यह वचन इसी भाव को दृढ़ करता है—

देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्।

अर्थात् देव और पितरों से संबंधित कर्तव्यों में प्रमाद नहीं करना चाहिए।

अतः इस पावन पितृ पक्ष में श्रद्धापूर्वक अपने पितरों का स्मरण करें। विधि-विधान से तर्पण करें, उनके निमित्त दान करें, जरूरतमंदों को भोजन कराएं और भगवान श्रीहरि से अपने कुल-पितरों की शांति एवं परिवार के मंगल की प्रार्थना करें।

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