सनातन धर्म में पूर्णिमा भक्ति और पुण्य कर्मों की पावन बेला मानी गई है। जब आकाश में चंद्र देव अपनी शीतल चांदनी बिखेरतें हैं, तब भक्तों का मन भी प्रभु की भक्ति में रम जाता है। भाद्रपद मास की पूर्णिमा इसी आध्यात्मिक भाव को और गहरा करती है। यह दिन भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की आराधना, व्रत, कथा-श्रवण, जप, दान और सेवा के लिए विशेष माना जाता है।
भाद्रपद पूर्णिमा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि इसके बाद पितृ पक्ष का आरंभ होता है। ऐसे में यह तिथि भगवान के प्रति श्रद्धा अर्पित करने के साथ अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनके निमित्त पुण्य कर्म करने की प्रेरणा देती है।
कहते हैं, जहाँ भक्ति होती है, वहाँ सेवा अपने आप जन्म लेती है। इसलिए इस पूर्णिमा पर पूजा की थाली के साथ किसी जरूरतमंद के लिए भोजन की थाली सजाना भी ईश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा का सुंदर रूप है।
पंचांग के अनुसार साल 2026 में भाद्रपद पूर्णिमा 26 सितंबर को मनाई जाएगी। पूर्णिमा तिथि का आरंभ 25 सितंबर 2026 की रात 11:06 बजे होगा और इसका समापन 26 सितंबर 2026 की रात 10:18 बजे होगा। उदयातिथि की मान्यता के अनुसार व्रत, पूजा और धार्मिक अनुष्ठान 26 सितंबर 2026 को करना शुभ रहेगा।
भाद्रपद पूर्णिमा पर भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की पूजा और सत्यनारायण कथा का श्रवण करने की परंपरा है। श्रद्धालु प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को पवित्र करके भगवान सत्यनारायण की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। स्थापना के बाद भगवान को चंदन, अक्षत, पुष्प, तुलसी दल, धूप और दीप अर्पित करें। पंचामृत से अभिषेक कर फल, मिष्ठान और सात्विक नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद श्रद्धापूर्वक सत्यनारायण कथा का पाठ या श्रवण करें। पूजा के समय प्रभु से सद्बुद्धि, सेवा भाव, परिवार के सुख और सभी प्राणियों के कल्याण की प्रार्थना करें।
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्॥
भगवान विष्णु के इस दिव्य स्वरूप का स्मरण करते हुए उन्हें प्रणाम करें।
सनातन परंपरा में पूर्णिमा व्रत को आत्मशुद्धि का माध्यम माना गया है। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपवास रखें और दिनभर भगवान का नाम-स्मरण, मंत्र-जप, भजन तथा कथा-श्रवण करें। लेकिन इस व्रत का वास्तविक भाव केवल अन्न का त्याग करना नहीं है। क्रोध का त्याग, अहंकार का त्याग, कटु वाणी का त्याग और नकारात्मक विचारों से दूरी…यही व्रत को सार्थक बनाते हैं।
इस दिन मन, वचन और कर्म को प्रभु की भक्ति से जोड़ने का संकल्प लें। किसी से प्रेमपूर्वक बात करें, किसी दुखी को सहारा दें और किसी जरूरतमंद की सहायता करें। क्योंकि जब उपवास के साथ करुणा जुड़ती है, तब साधना सेवा का रूप ले लेती है।
पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा है। चंद्र दर्शन के बाद स्वच्छ जल, दूध और पुष्प अर्पित कर चंद्रदेव का स्मरण करें। इसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए परिवार के सुख, शांति और मंगल की प्रार्थना करें। पूर्णिमा की शांत चांदनी में कुछ क्षण प्रभु का नाम-स्मरण करें। सांसारिक चिंताओं से मन को हटाकर ईश्वर के चरणों में स्वयं को समर्पित करें।
सनातन परंपरा में दान को धर्म और पुण्य का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। दान का मूल्य उसकी राशि से नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी भावना से तय होता है। जब किसी जरूरतमंद की आवश्यकता को अपनी आवश्यकता समझकर सहायता की जाती है, तब दान सच्चे परोपकार में बदल जाता है।
श्रीमद् भगवत गीता के अध्याय 17 के श्लोक 20 में दान की महिमा बताते हुए कहा गया है-
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥
अर्थात् जो दान बिना प्रतिफल की कामना से यथोचित समय और स्थान में किसी सुपात्र को दिया जाता है वह सात्विक दान माना जाता है।
इसलिए भाद्रपद पूर्णिमा पर अपनी श्रद्धा को किसी जरूरतमंद की आवश्यकता से जोड़ें। अन्न-दान या किसी असहाय की सहायता; सेवा का प्रत्येक भाव प्रभु के चरणों में समर्पित पुण्य कर्म बन जाता है।
भोजन किसी जरूरतमंद के लिए आशा और अपनत्व का माध्यम भी बन जाता है। भाद्रपद पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर नारायण सेवा संस्थान दीन-हीन, असहाय, निर्धन और दिव्यांग बच्चों के लिए भोजन सेवा का आयोजन कर रहा है।
आप भी इस पावन सेवा प्रकल्प में अपनी श्रद्धानुसार सहयोग कर किसी जरूरतमंद के जीवन में भोजन और मुस्कान पहुंचाने का पुण्य प्राप्त करें। भगवान सत्यनारायण के चरणों में की गई प्रार्थना के साथ जब सेवा का संकल्प जुड़ता है, तो यह पर्व और भी सार्थक बन जाता है। इस भाद्रपद पूर्णिमा पर सेवा और करुणा को अपनी भक्ति का हिस्सा बनाएं।
भाद्रपद पूर्णिमा सेवा और परोपकार के भाव को जीवन में उतारने का पावन अवसर है। इस दिन भगवान सत्यनारायण और माता लक्ष्मी का स्मरण करते हुए प्रार्थना करें कि हमारे भीतर सदैव दूसरों के सुख-दुःख को समझने और जरूरत के समय उनके काम आने की भावना बनी रहे। अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी जरूरतमंद को भोजन कराएं, किसी असहाय की सहायता करें या दान-पुण्य के किसी कार्य से जुड़ें। क्योंकि जब किसी जरूरतमंद के चेहरे पर आपके छोटे-से सहयोग से संतोष आता है, तो वही सेवा आत्मा को सच्चा सुख देती है।
इस भाद्रपद पूर्णिमा भगवान की पूजा के साथ सेवा का भी संकल्प लें और अपनी श्रद्धा को किसी जरूरतमंद के जीवन में खुशियों का माध्यम बनाएं।
प्रश्न: भाद्रपद पूर्णिमा 2026 कब मनाई जाएगी?
उत्तर: भाद्रपद पूर्णिमा 2026 में 26 सितंबर को मनाई जाएगी।
प्रश्न: भाद्रपद पूर्णिमा पर किन भगवान की पूजा करनी चाहिए?
उत्तर: इस दिन भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की पूजा करना विशेष फलदायी माना जाता है। साथ ही माता लक्ष्मी और चंद्रदेव का स्मरण एवं पूजन भी किया जा सकता है।
प्रश्न: भाद्रपद पूर्णिमा पर क्या दान करना चाहिए?
उत्तर: भाद्रपद पूर्णिमा पर अन्न दान करना फलदायी माना जाता है।
प्रश्न: भाद्रपद पूर्णिमा और पितृ पक्ष का क्या संबंध है?
उत्तर: भाद्रपद पूर्णिमा के बाद पितृ पक्ष का आरंभ होता है। जो पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का समय पवित्र समय होता है।