सनातन धर्म में भाद्रपद मास की पूर्णिमा का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। पूर्णिमा की पावन तिथि भगवान के स्मरण, पूजा-पाठ, जप-ध्यान, दान और सेवा के लिए अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और भक्ति से किए गए सत्कर्मों का विशेष फल प्राप्त होता है तथा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
भाद्रपद पूर्णिमा का धार्मिक महत्व
भाद्रपद पूर्णिमा के दिन पवित्र स्नान, भगवान का पूजन, मंत्र-जप, व्रत, कथा-श्रवण और दान-पुण्य करने की परंपरा है। मान्यता है कि पूर्णिमा के दिन सच्चे मन से प्रभु का स्मरण करने और धर्म-कर्म में मन लगाने से अंत:करण की शुद्धि होती है और ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।
सनातन परंपरा में पूर्णिमा का दिन दया, करुणा और परोपकार के भाव को जीवन में उतारने का अवसर भी माना गया है। जरूरतमंद की सहायता करना, भूखे को भोजन कराना और असहाय के जीवन में सहारा बनना प्रभु की सेवा के समान पुण्यकारी माना गया है।
दान और सेवा का महत्व
दान अपने भीतर के सेवा और करुणा भाव को प्रकट करने का माध्यम है। जब हमारी श्रद्धा किसी जरूरतमंद की आवश्यकता पूरी करने में सहायक बनती है, तब वह दान सेवा का रूप लेकर जीवन को सार्थक बनाता है।
श्रीमद् भगवत गीता के अध्याय 17 के श्लोक 20 में दान की महिमा बताते हुए कहा गया है-
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥
अर्थात् जो दान बिना प्रतिफल की कामना से यथोचित समय और स्थान में किसी सुपात्र को दिया जाता है वह सात्त्विक दान माना जाता है।
दीन-हीन, असहाय और दिव्यांग बच्चों को भोजन कराएं
इस पावन भाद्रपद पूर्णिमा के अवसर पर नारायण सेवा संस्थान द्वारा दीन-हीन, निर्धन, असहाय एवं दिव्यांग बच्चों के लिए भोजन सेवा की जा रही है। आप भी पूर्णिमा की अपनी श्रद्धा को सेवा से जोड़ें और किसी जरूरतमंद बच्चे की थाली तक पौष्टिक एवं मीठा भोजन पहुंचाने में सहभागी बनें।
इस भाद्रपद पूर्णिमा पर भगवान का स्मरण करें, पूजा-पाठ और दान के साथ सेवा का संकल्प लें और किसी जरूरतमंद बच्चे के जीवन में प्रसन्नता का एक सुंदर अवसर बनें।