हिंदू पंचांग में अमावस्या तिथि को विशेष आध्यात्मिक महत्व प्राप्त है। यह दिन आत्मचिंतन, पितरों के स्मरण, तर्पण, स्नान और दान-पुण्य के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इन्हीं पावन तिथियों में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या का विशेष स्थान है। इसे भाद्रपद अमावस्या, कुशग्रहणी अमावस्या और कुशोत्पाटिनी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक पितरों का तर्पण, जरूरतमंदों को दान और भगवान विष्णु का स्मरण करने से पितरों की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-शांति का मार्ग प्रशस्त होता है।
वर्ष 2026 में भाद्रपद अमावस्या 11 सितंबर को मनाई जाएगी। अमावस्या तिथि का प्रारंभ 10 सितंबर को प्रातः 10 बजकर 33 मिनट पर होगा और इसका समापन 11 सितंबर को सुबह 8 बजकर 56 मिनट पर होगा। सनातन परंपरा में उदयातिथि का महत्व है; इस कारण भाद्रपद अमावस्या 11 सितंबर को मनाई जाएगी। इस दिन पवित्र स्नान, पितरों का तर्पण, श्राद्ध, दान-पुण्य और भगवान का स्मरण करना विशेष फलदायी माना जाता है।
भाद्रपद अमावस्या को कुशग्रहणी अमावस्या भी कहा जाता है। इस दिन धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग होने वाली पवित्र कुशा घास को एकत्र करने की परंपरा है। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक प्राप्त की गई कुशा का उपयोग वर्षभर पूजा-पाठ, हवन, तर्पण और अन्य धार्मिक कार्यों में किया जा सकता है। साथ ही इस दिन दान-पुण्य करने से भगवान विष्णु और पितरों की कृपा प्राप्त होती है।
भाद्रपद अमावस्या के दिन श्रद्धालुओं को अपनी सामर्थ्य के अनुसार निम्न धार्मिक कार्य करने चाहिए-
कुशा को सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र माना गया है। कुशा एकत्र करने से पहले श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करें-
कुशाग्रे वसते रुद्रः कुश मध्ये तु केशवः।
कुशमूले वसेद् ब्रह्मा कुशान् मे देहि मेदिनी॥
इसके बाद ‘ॐ हूँ फट्’ मंत्र का उच्चारण करते हुए कुशा को जड़ सहित निकालें। कुशा हरी, स्वच्छ और पूर्ण होनी चाहिए। गंदी जगह, श्मशान अथवा रास्ते में पड़ी हुई कुशा का धार्मिक कार्यों में उपयोग नहीं करना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार यदि अमावस्या सोमवार को पड़े, तो उस दिन एकत्र की गई कुशा 12 वर्षों तक उपयोगी मानी जाती है।
सनातन धर्म में दान को पुण्य प्राप्ति का श्रेष्ठ माध्यम माना गया है। विशेष तिथियों पर किया गया दान केवल किसी जरूरतमंद की सहायता नहीं, बल्कि ईश्वर की सेवा का भी एक माध्यम माना जाता है। शास्त्रों में दान के महत्व को बताते हुए कहा गया है-
स्वर्गायुर्भूतिकामेन तथा पापोपशान्तये।
मुमुक्षुणा च दातव्यं ब्राह्मणेभ्यस्तथाऽहवम्॥
अर्थात् स्वर्ग, दीर्घायु और ऐश्वर्य की इच्छा रखने वाले तथा पापों की शांति और मोक्ष की कामना करने वाले व्यक्ति को पात्र व्यक्ति को श्रद्धापूर्वक दान करना चाहिए।
कहा जाता है कि जिस अन्न से किसी भूखे का पेट भरता है, वह केवल भोजन नहीं रहता, बल्कि सेवा और पुण्य का माध्यम बन जाता है। भाद्रपद अमावस्या के इस पावन अवसर पर किसी जरूरतमंद, असहाय या दिव्यांग बच्चे को भोजन कराना मानव सेवा के साथ ईश्वर सेवा के समान है।
इस अमावस्या पर नारायण सेवा संस्थान के दीन-हीन, असहाय और दिव्यांग बच्चों के भोजन सेवा प्रकल्प में सहयोग करके सेवा का संकल्प लें। आपका छोटा-सा सहयोग किसी बच्चे के चेहरे पर मुस्कान लाएगा।
इस भाद्रपद अमावस्या पर केवल अपने लिए नहीं, बल्कि किसी जरूरतमंद के लिए भी प्रार्थना करें। पितरों का स्मरण करें, भगवान हरि का नाम लें और अन्नदान के माध्यम से मानवता की सेवा करें। जहां सेवा का भाव होता है, वहीं ईश्वर की कृपा का वास होता है।
प्रश्न: भाद्रपद अमावस्या 2026 कब मनाई जाएगी?
उत्तर: भाद्रपद अमावस्या 2026 में 11 सितंबर को मनाई जाएगी।
प्रश्न: भाद्रपद अमावस्या को कुशग्रहणी अमावस्या क्यों कहा जाता है?
उत्तर: भाद्रपद अमावस्या पर वर्षभर के धार्मिक कार्यों के लिए पवित्र कुशा घास एकत्रित की जाती है। इसी कारण इसे कुशग्रहणी अमावस्या और कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी कहा जाता है।
प्रश्न: क्या भाद्रपद अमावस्या पर कुशा एकत्र करनी चाहिए?
उत्तर: हां, इस दिन धार्मिक कार्यों के लिए कुशा एकत्र करें।
प्रश्न: भाद्रपद अमावस्या पर कौन-सा दान करना चाहिए?
उत्तर: भाद्रपद अमावस्या पर अन्न दान करना चाहिए।