भारतीय संस्कृति में कुछ पर्व ऐसे हैं, जो रिश्तों की गहराई और जीवन के संस्कारों को अभिव्यक्त करते हैं। रक्षाबंधन भी ऐसा ही पावन पर्व है। श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह त्यौहार भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और आपसी समर्पण का प्रतीक है। बहन जब भाई की कलाई पर राखी बांधती है, तो उस छोटे-से धागे में प्रेम और मंगलकामना का भाव समाहित होता है।
वर्ष 2026 में रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन बहनें विधि-विधान से पूजा करके अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधेंगी और उनके सुखी, स्वस्थ एवं मंगलमय जीवन की कामना करेंगी।
राखी बांधने का शुभ मुहूर्त: सुबह 6:19 बजे से 9:48 बजे तक
कुल अवधि: 3 घंटे 28 मिनट
रक्षा और बंधन से मिलकर बना रक्षाबंधन अपने नाम में ही पर्व का संदेश समेटे हुए है। राखी भारतीय परंपरा में प्रेम और मंगलकामना की प्रतीक मानी गई है। बहन राखी बांधते हुए भाई के लिए दीर्घायु, सुख-समृद्धि और सफलता की प्रार्थना करती है। भाई भी बहन के प्रति अपने स्नेह और उसके सम्मान की रक्षा का संकल्प लेता है। इस प्रकार राखी दो हृदयों के बीच विश्वास का बंधन मजबूत करने की प्रतीक है।
हमारी धार्मिक परंपरा में रक्षा-सूत्र बांधने की परंपरा अत्यंत प्राचीन मानी जाती है। यज्ञ, पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों में भी पवित्र सूत्र बांधने की परंपरा रही है। यही कारण है कि रक्षाबंधन का संबंध हमारी आध्यात्मिक संस्कृति से भी जुड़ा हुआ है।
रक्षाबंधन से जुड़ी धार्मिक कथाओं में भगवान विष्णु और राजा बलि का प्रसंग विशेष रूप से स्मरण किया जाता है।
कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी। भगवान ने अपने विराट स्वरूप से दो पग में समस्त पृथ्वी और आकाश नाप लिया। तीसरे पग के लिए राजा बलि ने अपना शीश भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया। उनकी भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें पाताल लोक का अधिपति बना दिया और स्वयं उनके साथ रहने का वचन दिया।
जब माता लक्ष्मी को भगवान विष्णु के पाताल लोक में रहने का समाचार मिला, तो उन्होंने राजा बलि को अपना भाई माना और उनकी कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा। राजा बलि ने भी उन्हें बहन के रूप में स्वीकार किया और बहन की इच्छा का सम्मान करते हुए भगवान विष्णु को उनके साथ बैकुंठ लौटने दिया।
रक्षाबंधन के दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को स्वच्छ करके भगवान का स्मरण करें। इसके बाद थाली में रोली, अक्षत, दीपक, मिठाई और राखी रखें। सबसे पहले भगवान की पूजा करें। भाई को शुभ आसन पर बैठाकर उसके माथे पर रोली या चंदन से तिलक लगाएं और अक्षत अर्पित करें। इसके बाद दीपक से आरती करके भाई की कलाई पर श्रद्धापूर्वक राखी बांधें। मिठाई खिलाकर उसके सुखी और मंगलमय जीवन की कामना करें।
भाई भी बहन को स्नेह और आशीर्वाद देते हुए उसके सम्मान और सुरक्षा के लिए सदैव साथ खड़े रहने का संकल्प ले।
राखी बांधते समय मंत्र का उच्चारण करें-
येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामपि बध्नामि, रक्षे मा चल मा चल॥
इस मंत्र में राजा बलि के रक्षा-सूत्र का स्मरण करते हुए रक्षा और स्थिरता की प्रार्थना की जाती है। धार्मिक परंपरा में मंत्रोच्चार को शुभ संकल्प को शक्ति देने वाला माना गया है।
राखी चुनते समय उसकी सुंदरता के साथ उसके भाव को भी महत्व देना चाहिए। पारंपरिक मौली या सूती धागे से बनी राखी सादगी और धार्मिक भाव का प्रतीक मानी जाती है। ओम, स्वस्तिक, त्रिशूल जैसे शुभ धार्मिक प्रतीकों वाली राखियां भी भारतीय संस्कृति और आस्था से जुड़ी हुई हैं।
रुद्राक्ष या तुलसी से जुड़ी राखियां भी भक्तिभाव को अभिव्यक्त करती हैं। हालांकि राखी का वास्तविक महत्व उसकी कीमत या सजावट में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे प्रेम और शुभकामना में है। सच्चे मन से बांधा गया साधारण धागा भी रिश्ते के लिए अनमोल होता है।
समय बदल रहा है, जीवन की व्यस्तताएं बढ़ रही हैं और परिवार के सदस्य कई बार एक-दूसरे से दूर रहने लगे हैं। ऐसे में रक्षाबंधन हमें अपने रिश्तों की ओर लौटने का अवसर देता है। यह पर्व बचपन की यादों को ताजा करके यह कहने का अवसर भी है कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, अपनेपन का रिश्ता कमजोर नहीं होना चाहिए।
और इस भावना को परिवार की सीमा से आगे बढ़ाया जाए, तो रक्षाबंधन का संदेश और भी व्यापक हो जाता है। समाज में ऐसे अनेक लोग हैं, जिन्हें किसी के सहयोग, सम्मान और सहारे की आवश्यकता है। किसी जरूरतमंद की मदद करना, किसी दिव्यांग के जीवन में आत्मनिर्भरता का प्रकाश लाना, किसी निर्धन परिवार के चेहरे पर मुस्कान लाना… ये भी तो किसी की रक्षा और कल्याण का ही रूप हैं।
आप सभी को प्रेम और मंगलकामनाओं से परिपूर्ण रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं।