सनातन परंपरा में श्रावण पूर्णिमा को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी तिथि माना गया है। सावन का यह अंतिम पर्व भगवान शिव की आराधना, जप, ध्यान, दान और सेवा के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक कर सुख-शांति और मंगल की कामना करते हैं।
श्रावण पूर्णिमा का संबंध रक्षाबंधन से भी है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उनके सुखी, स्वस्थ और मंगलमय जीवन की कामना करती हैं।
श्रावण पूर्णिमा का धार्मिक महत्व
श्रावण मास भगवान शिव को समर्पित है। धार्मिक मान्यता है कि श्रावण पूर्णिमा के दिन भगवान शिव की श्रद्धापूर्वक पूजा, ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप और जरूरतमंदों की सहायता करने से जीवन में सकारात्मकता और पुण्य की प्राप्ति होती है।
भगवान शिव को आशुतोष कहा गया है…जो सच्ची श्रद्धा से शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए इस दिन पूजा के साथ मन में दया, करुणा और सेवा का भाव रखना भी शिव आराधना का सुंदर स्वरूप माना गया है।
दान और सेवा का महत्व
सनातन संस्कृति में दान और सेवा को पुण्यकारी कर्म माना गया है। किसी भूखे को भोजन कराना, किसी असहाय का सहारा बनना या किसी जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान लाना भी ईश्वर की सेवा के समान है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है-
प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान।
जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान॥
अर्थात् धर्म के चार चरण सत्य, दया, तप और दान प्रसिद्ध हैं, जिनमें से कलियुग में केवल दान ही सबसे कल्याणकारी माना गया है।
इसी भावना के साथ नारायण सेवा संस्थान द्वारा दीन-हीन, निर्धन, असहाय एवं दिव्यांग बच्चों के लिए भोजन सेवा की जा रही है। इस श्रावण पूर्णिमा आप भी अपनी श्रद्धा को सेवा से जोड़कर किसी जरूरतमंद बच्चे की थाली तक पौष्टिक भोजन पहुंचाने में सहभागी बनें।
इस पावन पूर्णिमा पर भगवान शिव की भक्ति, रक्षाबंधन के स्नेह और मानव सेवा के संकल्प के साथ पर्व को सार्थक बनाएं।