भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह भगवान विष्णु को समर्पित अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी तिथि मानी गई है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु का स्मरण, पूजन, व्रत, हरि नाम का जाप और दान-सेवा करने से भक्त को पुण्य की प्राप्ति होती है तथा जीवन में सुख, शांति और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
परिवर्तिनी एकादशी का धार्मिक महत्व
परिवर्तिनी एकादशी को भगवान विष्णु के शयनकाल से जुड़ी विशेष तिथि माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु अपनी शयन अवस्था में करवट बदलते हैं, इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। यह पावन तिथि भक्तों को आत्मचिंतन, संयम और प्रभु की भक्ति के साथ जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का संदेश देती है।
भगवान विष्णु को जगत का पालनहार कहा गया है। उनकी आराधना मनुष्य के भीतर श्रद्धा, सद्भाव और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा जगाती है। एकादशी तिथि पर श्रद्धापूर्वक किया गया व्रत, पूजन और दान भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का पावन माध्यम माना गया है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥
अर्थात् जो भक्त प्रेम और भक्ति से मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, उसकी भक्ति से अर्पित उस वस्तु को मैं स्वीकार करता हूं।
एकादशी पर दान और सेवा
सनातन संस्कृति में व्रत और पूजा के साथ दान एवं सेवा का विशेष महत्व है। किसी जरूरतमंद के जीवन में सहारा, सम्मान और प्रसन्नता लाना भी ईश्वर की आराधना का ही एक स्वरूप माना गया है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है-
तुलसी पंछी के पिये, घटे न सरिता नीर।
दान दिये धन ना घटे, जो सहाय रघुवीर।।
अर्थात् जिस प्रकार पक्षियों के पानी पीने से नदी का जल कम नहीं होता, उसी प्रकार भगवान श्रीराम की कृपा से दान और परोपकार करने से धन और पुण्य कभी कम नहीं होते।
दीन-हीन, असहाय, दिव्यांग बच्चों को भोजन कराएं
इस परिवर्तिनी एकादशी के पुण्यदायी अवसर पर नारायण सेवा संस्थान द्वारा दीन-हीन, निर्धन, असहाय एवं दिव्यांग बच्चों के लिए भोजन सेवा की जा रही है। आप भी अपनी श्रद्धा को सेवा से जोड़ें और किसी जरूरतमंद बच्चे की थाली तक पौष्टिक मीठा भोजन पहुंचाने में सहभागी बनें।
इस पावन परिवर्तिनी एकादशी पर भगवान विष्णु का स्मरण करें, हरि नाम का जाप करें, व्रत और पूजा के साथ सेवा का संकल्प लें। किसी जरूरतमंद बच्चे की थाली में भोजन और उसके जीवन में खुशियों का उजाला पहुंचाकर अपनी भक्ति को सेवा का स्वरूप दें।