भारतीय संस्कृति में प्रत्येक पर्व उत्सव के साथ-साथ आध्यात्मिक संदेश और जीवन दर्शन का प्रतीक होता है। उन्हीं पावन पर्वों में से एक है होली। जो रंगों, उल्लास और भक्ति का अद्भुत संगम माना गया है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल बाहरी रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि अंतर्मन को प्रेम, करुणा और सद्भाव से रंगने का अवसर है।
इस साल 3 मार्च को चंद्रग्रहण लगने जा रहा है। इसलिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि रंग कब खेला जाएगा? ज्योतिष के अनुसार चंद्रग्रहण लगने के नौ घंटे पहले से सूतक काल प्रारंभ हो जाता है।
सूतक काल में किसी भी तरह के धार्मिक उत्सव मनाने से परहेज किया जाता है। ऐसे में होली 4 मार्च 2026 को मनाया जाएगा। अगर शास्त्र सम्मत विधि की बात की जाए तो ग्रहण के समापन के उपरांत रंग खेल सकते हैं। इसलिए धुलंडी 4 मार्च को ही खेली जाएगी।
पंचांग के अनुसार इस बार होली के साथ ही चंद्रग्रहण भी लगने जा रहा है, जो भारत में दृश्यमान रहेगा। इसलिए सम्पूर्ण भारत में ग्रहण का सूतककाल भी लागू रहेगा।
भारतीय समयानुसार, चंद्रग्रहण 3 मार्च को दोपहर में 3 बजकर 20 मिनट से प्रारंभ हो जाएगा। जिसका समापन शाम 6 बजकर 47 मिनट पर होगा। अगर कुल अवधि की बात की जाए तो इस बार का चंद्रग्रहण 3 घंटे 27 मिनट तक दिखेगा।
होली का मूल संबंध भक्त प्रह्लाद और उनके पिता हिरण्यकशिपु की कथा से जुड़ा है। हिरण्यकशिपु असुरराज था, जिसने अपने अहंकार में स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया था। किंतु उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था।
अनेक यातनाएँ देने के बावजूद प्रह्लाद की भक्ति अडिग रही। अंततः हिरण्यकशिपु की बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई।
किन्तु दैवीय न्याय देखिए, होलिका जलकर भस्म हो गई और प्रह्लाद सुरक्षित रहे। इसी स्मृति में होलिका दहन किया जाता है। यह दहन केवल लकड़ियों, गोबर के उपलों और बल्लों का नहीं, बल्कि अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या और पाप प्रवृत्तियों का होता है।
होलिका दहन के दूसरे दिन रंगों की होली खेली जाती है। यह दिन सामाजिक समरसता और आपसी प्रेम का प्रतीक है। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, जाति-पंथ के भेद मिटाकर सभी एक-दूसरे को रंग लगाते हैं।
सनातन परंपरा में ब्रजभूमि में इस त्यौहार का विशेष महत्व है। वृंदावन और बरसाना की लठमार होली विश्व प्रसिद्ध है। इस त्यौहार राधा-कृष्ण की दिव्य लीलाओं की स्मृति है, जो ब्रज जी गलियों सहित पूरे भारत में आज भी जीवंत है।
होली रंगों के पर्व के साथ पकवानों और मिठाई का भी त्यौहार है। इस पर्व में हर घर में तरह-तरह की मिठाइयां और पकवान बनाए जाते हैं। आइए जानते हैं इस त्यौहार पर बनाएं जाने वाले कुछ खास पकवानों के बारे में-
इन मिठाई और पकवानों के अलावा घरों में गाठिये, नमकीन पूड़ियां और मालपुए भी इस त्यौहार का जायका बढ़ाते हैं।
होली भारत के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरीकों से मनाई जाती है। होली मानने की कुछ परंपराएं-
1. ब्रज की लठमार होली (बरसाना और नंदगांव):
ब्रज की लठमार होली दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यहाँ पर खेली जाने वाली होली भगवान कृष्ण व राधा के प्रेम का प्रतीक मानी जाती है।
मान्यता है कि कृष्ण अपने सखाओं के साथ बरसाना होली खेलने जाते थे और राधा व उनकी सखियाँ उन्हें लाठियों से रोकती थीं। इसलिए आज भी यह होली खेली जाती है। जिसमें महिलाएं पुरुषों को डंडों से पीटती हैं। पुरुष खुद को ढाल से बचाते हैं। यह पूरी होली हंसी-मजाक और गीतों के साथ होती है।
2. फूलों की होली (वृंदावन, उत्तर प्रदेश):
फूलों की होली वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में एकादशी के दिन मनाई जाती है। यहाँ रंगों या गुलाल की जगह ताजे फूलों की पंखुड़ियों का उपयोग किया जाता है। मंदिर के पुजारी भक्तों पर फूल बरसाते हैं। भक्त भगवान पर फूल और गुलाल उड़ाते हैं।
3. धुलंडी और डोलची होली (राजस्थान):
यह मुख्य रूप से राजस्थान के जयपुर, उदयपुर और कोटा जैसे शहरों के आस पास के क्षेत्र में मनाई जाती है। इस दिन लोग एक-दूसरे को अबीर-गुलाल और पानी वाले रंगों से सराबोर कर देते हैं।
टोलियां बनाकर ढोल-नगाड़ों के साथ शहर या गाँव की गलियों में निकलते हैं और ‘होली है’ का शोर मचाते हैं। साथ ही मारवाड़ क्षेत्र में पारंपरिक कपड़े पहनकर ढोल-नगाड़ों के साथ नृत्य करते हैं। बीकानेर की डोलची होली में डोलची भरकर एक दूसरे के ऊपर पानी डालते हैं।
4. होला मोहल्ला (पंजाब):
यह पंजाब में खेली जाने वाली होली है जिसे सिख समुदाय वीरता के प्रतीक के रूप में मनाता है। इसकी शुरुआत गुरु गोविंद सिंह जी ने की थी ताकि सिखों में सैन्य कौशल और वीरता का विकास हो सके। आनंदपुर साहिब में लगने वाले इस मेले में निहंग सिख घुड़सवारी, तलवारबाजी और युद्ध कला का प्रदर्शन करते हैं।
5. रंगपंचमी (महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश):
रंगपंचमी विशेष तौर पर महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में मनाई जाती है। मध्य परदेश के मालवा क्षेत्र में इस दिन बड़े आयोजन होते हैं। इंदौर के राजवाड़ा में निकालने वाली रंगपंचमी ‘गेर’ विश्व प्रसिद्ध है। रंग पंचमी के दिन सड़कों पर पानी की बौछारें की जाती हैं और लोग रंगों में डूब जाते हैं।
6. बैठकी और खड़ी होली (कुमाऊं, उत्तराखंड):
इसे ‘बैगवाल’ या कुमाऊंनी होली के नाम से भी जाना जाता है। जो मुख्य तौर से उत्तराखंड के कुमाऊं में मनाई जाती है।
इस होली में संगीत का विशेष महत्व है। यहाँ होली केवल एक दिन का पर्व नहीं बल्कि महीनों चलने वाला संगीत का उत्सव है। लोग घरों में जमा होकर पहाड़ी होली गीत गाते हैं। साथ ही ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा पहनकर घेरा बनाकर नृत्य करते हुए गीत गाते हैं।
आज के समय में होली मनाते हुए हमें पर्यावरण का भी ध्यान रखना चाहिए। रासायनिक रंगों के स्थान पर प्राकृतिक और हर्बल रंगों का उपयोग करना चाहिए। जल की बचत करें और इस त्यौहार को सात्विक, मर्यादित तथा आनंदमय बनाएँ।
होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और प्रेम का पर्व है। जीवन में परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि हमारे हृदय में भक्ति और सत्य का प्रकाश है, तो कोई भी होलिका हमें जला नहीं सकती।
इस पावन अवसर पर अपने भीतर की दुर्भावनाओं को होलिका में अर्पित करें और प्रेम, क्षमा तथा सद्भाव के रंगों से अपने जीवन को आलोकित करें।
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न: होली कब है?
उत्तर: होली 4 मार्च को मनाई जाएगी।
प्रश्न: चंद्रग्रहण कब है?
उत्तर: चंद्रग्रहण 3 मार्च 2026 को लगने जा रहा है।
प्रश्न: चंद्रग्रहण समय क्या है?
उत्तर: चंद्रग्रहण 3 मार्च 2026 को दोपहर 3 बजकर 20 मिनट से शाम 6 बजकर 47 मिनट तक रहेगा।
प्रश्न: धुलंडी कब है?
उत्तर: धुलंडी या रंगोत्सव 4 मार्च को मनाई जाएगी।