02 November 2026

गोवर्धन पूजा 2026: जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Start Chat

दीपावली के दीप अभी घर-आँगन को रोशन कर ही रहे होते हैं कि अगले दिन एक और पावन पर्व भक्ति और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश लेकर आता है, जिसे हम गोवर्धन पूजा के नाम से जानते हैं। यह वह दिन है, जब भगवान श्रीकृष्ण के उस दिव्य स्वरूप का स्मरण किया जाता है, जिसने ब्रजवासियों को देवराज इंद्र के प्रकोप से बचाकर यह बताया कि सच्ची श्रद्धा केवल भय से नहीं, बल्कि प्रेम और विश्वास से जन्म लेती है।

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन की जाने वाली गोवर्धन पूजा का दृश्य मन को सहज ही भक्ति से भर देता है। सभी लोग घर के आँगन में गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाते हैं, अन्नकूट के रूप में अनेक प्रकार के पकवान भगवान को अर्पित करते हैं और गिरिराज महाराज की परिक्रमा कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इस पर्व के पीछे भगवान श्रीकृष्ण की एक ऐसी लीला छिपी है, जो आज भी मनुष्य को प्रकृति का सम्मान करने, अहंकार त्यागने और ईश्वर पर अटूट विश्वास रखने की प्रेरणा देती है।

 

गोवर्धन पूजा 2026 कब है?

वर्ष 2026 में गोवर्धन पूजा का पावन पर्व 10 नवंबर, मंगलवार को मनाया जाएगा। द्रिक पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि का आरंभ 9 नवंबर 2026 को दोपहर 12 बजकर 31 मिनट पर होगा, जबकि इसका समापन 10 नवंबर 2026 को दोपहर 2 बजे होगा। सनातन धर्म में पर्व-त्योहारों की तिथि निर्धारित करने में उदयातिथि का विशेष महत्व माना जाता है। इसी परंपरा के अनुसार इस वर्ष गोवर्धन पूजा 10 नवंबर को मनाई जाएगी।

गोवर्धन पूजा के लिए प्रातःकालीन शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 40 मिनट से 8 बजकर 50 मिनट तक रहेगा। इस पावन अवधि में श्रद्धालु विधि-विधान से गोवर्धन महाराज का पूजन करें।

 

गोवर्धन पूजा की पौराणिक कथा

परंपरा के अनुसार, द्वापर युग में ब्रज में देवराज इंद्र की पूजा की जाती थी। मान्यता थी कि इंद्र की कृपा से वर्षा होती है और वर्षा से खेतों में अन्न उपजता है। इसलिए ब्रजवासी उन्हें प्रसन्न करने के लिए पूजा और भोग की व्यवस्था करते थे।

बालक श्रीकृष्ण ने जब यह देखा, तो नंद बाबा और अन्य ब्रजवासियों से पूछा कि वे इंद्र की पूजा क्यों कर रहे हैं? उन्होंने सभी से इन्द्र देव की पूजा बंद करने का आग्रह किया। सभी को समझाया कि ब्रज के लोगों के लिए गोवर्धन पर्वत अत्यंत महत्वपूर्ण है। पर्वत से गौओं को चारा मिलता है, वनस्पतियाँ पनपती हैं। ऐसे में इन्द्र देव की पूजा करने की जगह गोवर्धन पर्वत, गौमाता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना अधिक उचित है। श्रीकृष्ण की बात ब्रजवासियों के हृदय में उतर गई। उन्होंने गोवर्धन पर्वत की पूजा की, गौमाता का सम्मान किया और अनेक प्रकार के पकवान बनाकर गोवर्धन भगवान को अर्पित किए। 

जब देवराज इंद्र को इस बात का पता चला, तो उन्हें अपना अपमान प्रतीत हुआ। क्रोध में उन्होंने ब्रज पर घनघोर वर्षा की। आकाश में काले बादल छा गए, बिजली चमकने लगी और मूसलाधार वर्षा से ब्रजवासी भयभीत हो उठे। पशु, पक्षी और मनुष्य सभी संकट में पड़ गए।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा उँगली पर विशाल गोवर्धन पर्वत उठा लिया और समस्त ब्रजवासियों को उसके नीचे आश्रय दिया। सात दिनों तक वर्षा होती रही, लेकिन श्रीकृष्ण की शरण में आए ब्रजवासियों का कोई अनिष्ट नहीं हुआ। अंततः इंद्र देव को अपनी भूल का एहसास हुआ। उनका अहंकार शांत हुआ और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की दिव्यता को स्वीकार किया।

 

गोवर्धन पूजा का धार्मिक महत्व

गोवर्धन पूजा में भगवान श्रीकृष्ण को गिरिराज धारण करने वाले स्वरूप में पूजा जाता है। इस पर्व का एक संदेश यह है कि मनुष्य को उस प्रकृति के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए, जो बिना किसी भेदभाव के सभी प्राणियों का पालन करती है। गोवर्धन पर्वत को ब्रज की आस्था में भगवान का स्वरूप माना गया है। भक्त गिरिराज महाराज की पूजा करके सुख, शांति, समृद्धि और परिवार के मंगल की कामना करते हैं। वहीं इस दिन गौपूजन के माध्यम से गौमाता के प्रति सम्मान और उसके पालन-पोषण के महत्व को स्वीकार किया जाता है।

 

अन्नकूट महोत्सव क्यों मनाया जाता है?

गोवर्धन पूजा के अवसर पर अन्नकूट बनाने की विशेष परंपरा है। ‘अन्नकूट’ का अर्थ है अनेक प्रकार के अन्न और व्यंजनों का समूह। इस दिन घरों और मंदिरों में विभिन्न प्रकार के पकवान, मिठाइयाँ, सब्जियाँ, अनाज और अन्य खाद्य पदार्थ तैयार करके भगवान श्रीकृष्ण को भोग लगाया जाता है। अन्नकूट में केवल पकवानों की विविधता ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उसके पीछे छिपा भाव भी उतना ही पवित्र है.. जो कुछ हमें प्राप्त हुआ है, उसके लिए ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त करना ही अन्नकूट महोत्सव का मुख्य अभिप्राय है ।

इस दिन मंदिरों में दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं। अन्नकूट का भोग अर्पित करने के बाद प्रसाद का वितरण किया जाता है। कई स्थानों पर सामूहिक भंडारे और सेवा के आयोजन भी होते हैं।

अन्नकूट का यह संदेश आज भी प्रासंगिक है कि अन्न केवल हमारी थाली तक सीमित रहने वाली वस्तु नहीं, बल्कि अनेक लोगों के परिश्रम और प्रकृति की कृपा का परिणाम है। इसलिए अन्न का आदर करना, उसे व्यर्थ न गँवाना और भूखे व्यक्ति तक भोजन पहुँचाना भी इस पर्व की भावना के अनुरूप है।

 

गोवर्धन पूजा की विधि

गोवर्धन पूजा श्रद्धा और सरलता से की जाती है। पूजा की परंपरा परिवार, क्षेत्र और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है, लेकिन सामान्यतः निम्न विधि अपनाई जाती है। 

  • सबसे पहले प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को साफ करें। इसके बाद आँगन या किसी स्वच्छ स्थान पर गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाएँ। इसे फूलों, घास, पत्तियों और अन्य पूजन सामग्री से सजाया जा सकता है।
  • पूजा की तैयारी करने के उपरांत गोवर्धन महाराज के समक्ष दीपक जलाएँ और धूप, पुष्प, रोली, अक्षत, जल तथा नैवेद्य अर्पित करें। भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए गोवर्धन पूजा की कथा सुनें या पढ़ें। इसके बाद गौमाता का पूजन करें और उनके लिए चारे अथवा उपयुक्त आहार की व्यवस्था करें।
  • परिवार की परंपरा के अनुसार तैयार किए गए अन्नकूट का भगवान को भोग लगाएँ। श्रद्धापूर्वक आरती करें और प्रसाद वितरित करें। जहाँ संभव हो, जरूरतमंदों को भोजन कराएँ तथा पशु-पक्षियों के लिए जल और भोजन रखें।

गोवर्धन पूजा में बाहरी आडंबर से अधिक महत्व श्रद्धा, कृतज्ञता और सेवा-भाव का है। सच्चे मन से की गई छोटी-सी सेवा भी इस पर्व को सार्थक बना सकती है।

 

गोवर्धन परिक्रमा का महत्व

गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा ब्रज की अत्यंत प्राचीन और पवित्र धार्मिक परंपराओं में से एक है। श्रद्धालु गिरिराज महाराज को भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप मानकर उनकी परिक्रमा करते हैं। परिक्रमा के दौरान भक्त गिरिराज महाराज का स्मरण करते हैं, भजन गाते हैं और राधा-कृष्ण की भक्ति में लीन रहते हैं। कुछ श्रद्धालु दंडवत परिक्रमा भी करते हैं। यह साधना धैर्य, समर्पण और अटूट आस्था का प्रतीक है।

हालाँकि, परिक्रमा करना हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य नहीं है। अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार ही यात्रा करें। जो श्रद्धालु ब्रज नहीं पहुँच पाते, वे अपने घर पर गिरिराज महाराज का स्मरण करके, कथा सुनकर और श्रद्धापूर्वक पूजा करके भी इस पर्व का पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।

 

गोवर्धन पूजा पर करें सेवा और लें सेवा का संकल्प

गोवर्धन पूजा का उत्सव तब और सार्थक हो जाता है, जब हमारी श्रद्धा किसी दूसरे के लिए सहारा बनती है। भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को संकट से बचाकर करुणा और संरक्षण का आदर्श प्रस्तुत किया। उसी भावना को अपनाते हुए हम इस पवित्र पर्व पर भूखे को भोजन, जरूरतमंद को सहायता और असहाय जीवों को संरक्षण देने का संकल्प ले सकते हैं।

अन्नकूट के अवसर पर भोजन की बर्बादी रोकने का संकल्प लें, जरूरतमंद परिवारों तक भोजन पहुँचाएँ और पशु-पक्षियों के लिए जल की व्यवस्था करें। अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी की सहायता करना भी भगवान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक सुंदर माध्यम है।

इस गोवर्धन पूजा पर अपने मन में विनम्रता, व्यवहार में करुणा और कर्मों में सेवा का भाव जगाएँ। भगवान श्रीकृष्ण के आशीर्वाद से सभी को सुखी जीवन और परोपकार की शक्ति मिले, यही प्रार्थना है।

 

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

 

प्रश्न: गोवर्धन पूजा कब है?

उत्तर: गोवर्धन पूजा 2026 में 10 नवंबर को मनाई जाएगी। 

प्रश्न: गोवर्धन पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?

उत्तर: गोवर्धन पूजा के लिए प्रातःकालीन शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 40 मिनट से 8 बजकर 50 मिनट तक रहेगा। 

प्रश्न: गोवर्धन पूजा क्यों मनाई जाती है?

उत्तर: धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्रदेव के प्रकोप से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा अंगुली पर उठाया था। इसी प्रसंग की स्मृति में गोवर्धन पूजा मनाई जाती है।

प्रश्न: गोवर्धन पूजा में गोबर से गोवर्धन पर्वत क्यों बनाया जाता है?

उत्तर: इस दिन गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाकर उसकी पूजा की जाती है। यह प्रकृति, गौमाता और गोवर्धन पर्वत के प्रति श्रद्धा एवं सम्मान का प्रतीक माना जाता है।

प्रश्न: गोवर्धन पूजा और अन्नकूट क्या एक ही पर्व हैं?

उत्तर: गोवर्धन पूजा और अन्नकूट एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। गोवर्धन पूजा के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण को छप्पन भोग सहित अनेक व्यंजनों का भोग अर्पित किया जाता है, जिसे अन्नकूट उत्सव कहा जाता है।

X
राशि = ₹