@narayansevasansthan बिहार के भोजपुर की रहने वाली यासमीन खातून का बचपन उन मासूम खुशियों से नहीं भरा था, जिनका सपना हर बच्चा देखता है। मात्र 4 वर्ष की उम्र में उनके पैरों में विकृति आने लगी। समय के साथ उनके पैर इतने टेढ़े हो गए कि चलना-फिरना तो दूर, रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम भी उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गए। जहाँ उनकी उम्र के बच्चे खेलते-कूदते थे, वहीं यासमीन दर्द, बेबसी और संघर्ष के साथ अपना बचपन बिताने को मजबूर थीं।
यासमीन कहती हैं, “जिस बचपन को बच्चे हँसते-खेलते जीते हैं, वह मैंने दर्द और तकलीफों के बीच गुजारा है।” उनकी यह पीड़ा केवल शारीरिक नहीं थी, बल्कि हर दिन टूटते सपनों और सीमित होती उम्मीदों की भी कहानी थी।
इसी बीच उनके माता-पिता ने टीवी पर नारायण सेवा संस्थान के सेवा कार्यों के बारे में देखा। एक नई उम्मीद के साथ वे यासमीन को लेकर संस्थान पहुंचे। यहाँ विशेषज्ञ चिकित्सकों ने इलिजारोव तकनीक के माध्यम से उनका पूर्णतः निःशुल्क ऑपरेशन किया। उपचार के लंबे और धैर्यपूर्ण सफर के बाद, जब छह माह पश्चात इलिजारोव उपकरण हटाया गया, तब यासमीन के पैर सीधे हो चुके थे।
आज यासमीन अपने पैरों पर आत्मविश्वास के साथ खड़ी हैं। वह बिना किसी सहारे के चल-फिर सकती हैं और जीवन को नए उत्साह के साथ जी रही हैं। जो कदम कभी दर्द और लाचारी से बंधे हुए थे, वही कदम आज उनके सपनों की ओर बढ़ रहे हैं। यासमीन की यह मुस्कान और आत्मनिर्भरता, सेवा और समर्पण की उस शक्ति का प्रमाण है जो किसी का जीवन बदल सकती है।
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