@narayansevasansthan सोनीपत के रहने वाले पवन के जीवन में दुखों का पहाड़ तब टूटा, जब एक दिन अपने मित्र की कार से जाते समय अचानक उसमें भीषण आग लग गई। उस एक खौफनाक हादसे ने हंसते-खेलते पवन की जिंदगी को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया। इस हृदयविदारक घटना में उन्होंने अपना एक पैर हमेशा के लिए खो दिया। जो इंसान कभी अपने पैरों पर शान से खड़ा था, वह पल भर में शारीरिक रूप से असहाय और शक्तिहीन हो गया।
दुखों का सिलसिला यहीं नहीं थमा; इस शारीरिक लाचारी का सबसे गहरा और दर्दनाक असर उनकी निजी जिंदगी पर पड़ा। जब पवन को सबसे ज्यादा सहारे की जरूरत थी, तब उनकी जीवनसंगिनी भी उन्हें बेसहारा छोड़कर चली गई। अचानक आए इस अकेलेपन और लाचारी के बीच अब उनके बूढ़े माता-पिता और मासूम बच्चे ही उनका एकमात्र सहारा बचे। पवन दिन-रात अपने बच्चों के धुंधले भविष्य को सोचकर गहरी चिंता और मानसिक अवसाद में डूबने लगे।
तभी, घोर निराशा के उस दौर में, पवन के जीवन में उम्मीद की किरण चमकी। उन्हें किसी शुभचिंतक के माध्यम से नारायण सेवा संस्थान के के बारे में पता चला। भारी मन और अटूट आस लेकर जब पवन संस्थान पहुंचे, तो यहाँ के संवेदनशील डॉक्टरों ने उनके पैर का सटीक माप लिया। इसके बाद, संस्थान द्वारा उन्हें जापान और जर्मन तकनीक से निर्मित अत्याधुनिक 3-डी प्रिंटेड नारायण मॉड्यूलर आर्टिफिशियल लिंब लगाया गया।
इस कृत्रिम पैर ने पवन को न सिर्फ एक नया अंग दिया, बल्कि उनके खोए हुए आत्मसम्मान और जीने की चाह को भी वापस लौटा दिया। आज पवन इसी कृत्रिम पैर के सहारे हजारों किलोमीटर की लंबी यात्राएं कर चुके हैं, बिना किसी झिझक के तीर्थयात्राओं पर जाते हैं और उनके चेहरे पर एक आत्मसंतोष की मुस्कान रहती है। इस अद्भुत तकनीक और संस्थान के सेवाभाव की बदौलत, पवन एक बार फिर समाज में सिर उठाकर अपने परिवार के साथ एक बेहद खुशहाल और सार्थक जीवन जी रहे हैं।
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