हर-हर महादेव की गूंज, कांवड़ियों की आस्था, शिवालयों में उमड़ती भक्तों की भीड़ और शिवलिंग पर निरंतर होता जलाभिषेक श्रावण मास का आगमन केवल पंचांग में एक नए महीने की शुरुआत नहीं, बल्कि शिवभक्ति के उस पावन काल का आरंभ है, जब पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है।
सनातन धर्म में वर्ष के बारह महीनों का अपना-अपना महत्व है, लेकिन श्रावण मास का स्थान सबसे विशिष्ट माना गया है। यह वह समय है जब भगवान शिव की आराधना का फल कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि लाखों श्रद्धालु इस पूरे महीने व्रत रखते हैं, शिवलिंग का अभिषेक करते हैं, रुद्राष्टाध्यायी का पाठ करते हैं और ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप करते हैं।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर श्रावण मास ही भगवान शिव को इतना प्रिय क्यों है? इसका उत्तर स्वयं भगवान शिव ने शिव पुराण में दिया है।
शिव पुराण में भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं-
द्वादशस्वपि मासेषु श्रावणो मेऽतिवल्लभः ।
श्रवणार्हं यन्माहात्म्यं तेनासौ श्रवणो मतः ॥
श्रवणर्क्षं पौर्णमास्यां ततोऽपि श्रावणः स्मृतः।
यस्य श्रवणमात्रेण सिद्धिदः श्रावणोऽप्यतः ॥
अर्थ: भगवान शिव कहते हैं कि बारहों महीनों में श्रावण मास मुझे सबसे अधिक प्रिय है। इसका माहात्म्य इतना महान है कि इसका श्रवण करना भी पुण्यदायक है, इसलिए इसका नाम श्रावण पड़ा। इस मास में श्रवण नक्षत्र युक्त पूर्णिमा आती है; इसलिए इसे श्रावण कहा जाता है। इतना ही नहीं, इसके माहात्म्य का श्रवण मात्र करने से भी साधक को सिद्धि और पुण्य की प्राप्ति होती है।
यही कारण है कि श्रावण मास को भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त करने का दिव्य अवसर माना गया है।
पुराणों के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया, तब सबसे पहले हलाहल नामक विष निकला। उसके प्रभाव से सम्पूर्ण सृष्टि संकट में पड़ गई। तब भगवान शिव ने लोककल्याण के लिए उस विष का पान कर लिया। विष के प्रभाव को शांत करने के लिए देवताओं ने उनके मस्तक और शिवलिंग पर निरंतर जल अर्पित किया।
मान्यता है कि इसी घटना की स्मृति में श्रावण मास में जलाभिषेक की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित हुई। शिवलिंग पर अर्पित की गई प्रत्येक जल की बूंद भक्त की श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक मानी जाती है।
श्रावण मास का संबंध माता पार्वती की कठोर साधना से भी जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए अनेक वर्षों तक तप किया। उनकी अटूट भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया।
इसी कारण श्रावण मास को अखंड सौभाग्य और मनोवांछित जीवनसाथी की कामना के लिए भी अत्यंत शुभ माना जाता है। श्रावण सोमवार का व्रत विशेष रूप से इसी विश्वास के साथ रखा जाता है।
भगवान शिव केवल संहार के देवता नहीं, बल्कि सृष्टि में संतुलन, वैराग्य और आत्मज्ञान के भी प्रतीक हैं। उनके मस्तक पर विराजमान चंद्रमा मन की शीतलता का संदेश देता है, जटाओं से प्रवाहित गंगा पवित्रता का प्रतीक है और गले में धारण किया गया सर्प भय पर विजय का संकेत देता है। श्रावण मास हमें भी यही प्रेरणा देता है कि बाहरी पूजा के साथ-साथ मन को भी पवित्र बनाया जाए। क्रोध के स्थान पर क्षमा, अहंकार के स्थान पर विनम्रता और असत्य के स्थान पर सत्य को अपनाना ही शिवत्व की ओर पहला कदम है।
धर्मग्रंथों में श्रावण मास के दौरान कुछ विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें अत्यंत पुण्यदायी माना गया है-
आज के व्यस्त जीवन में श्रावण मास हमें कुछ पल रुककर स्वयं को देखने का अवसर देता है। यह महीना हमें बताता है कि जीवन में भौतिक उपलब्धियों के साथ आध्यात्मिक उन्नति भी आवश्यक है। जब मन शिव के नाम में स्थिर होता है, तब तनाव कम होता है और जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है।
महादेव की उपासना भी हमें यही बताती है कि सादगी और धैर्य ही जीवन की सबसे बड़ी शक्तियाँ हैं। यही कारण है कि हजारों वर्षों से भगवान शिव करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र बने हुए हैं।
श्रावण मास भगवान शिव के प्रति श्रद्धा, भक्ति और आत्मसमर्पण का पावन पर्व है। स्वयं महादेव ने इस महीने को अपना सबसे प्रिय बताया है। इसलिए इस पूरे माह में शिव नाम का स्मरण, जलाभिषेक, मंत्र-जप, व्रत और धर्मग्रंथों का श्रवण विशेष फलदायी माना गया है।
यदि इस श्रावण मास में हम भगवान शिव के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें, तो यही उनकी सच्ची आराधना होगी। इस जगत के सभी प्राणियों पर भगवान भोलेनाथ की कृपा बनी रहे।
हर-हर महादेव!