भारतीय संस्कृति में सेवा करना किसी जरूरतमंद में भगवान नारायण के दर्शन करने की भावना मानी जाती है। इसी विचार को आधार बनाकर नारायण सेवा संस्थान द्वारा 23 अक्टूबर 1985 को उदयपुर की धरती से सेवा यात्रा आरंभ की गई। आज 41 वर्षों बाद यह यात्रा उपचार, पुनर्वास, शिक्षा, कौशल विकास और सामाजिक सशक्तिकरण के माध्यम से हजारों-लाखों जरूरतमंदों के जीवन में आशा का प्रकाश जगा रही है।
नारायण सेवा संस्थान का मूल मंत्र है, “नर सेवा ही नारायण सेवा”। यही विचार संस्थान की प्रत्येक सेवा प्रकल्प के केंद्र में है। संस्थान का प्रयास है कि शारीरिक या आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे लोगों को केवल उपचार ही नहीं, बल्कि सम्मानपूर्वक और आत्मनिर्भर जीवन जीने का अवसर भी मिले।
नारायण सेवा संस्थान की सेवा यात्रा के पीछे एक ऐसी घटना है, जिसने परम पूज्य गुरुदेव पद्मश्री कैलाश ‘मानव’ जी के जीवन की दिशा बदल दी।
उदयपुर के सरकारी अस्पताल में उन्होंने एक जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन की थाली से एक रोटी खाते और शेष रोटियां संभालकर रखते देखा। बातचीत में पता चला कि वह व्यक्ति अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ अस्पताल आया था और अस्पताल में मरीजों के लिए वितरित किए जाने वाले सीमित भोजन को परिवार के बीच बांटकर किसी तरह गुजारा कर रहा था। इस दृश्य ने गुरुदेव को भीतर से झकझोर दिया।
उन्होंने महसूस किया कि अस्पताल में उपचार के लिए आने वाले मरीजों के साथ उनके परिजन भी कठिन परिस्थितियों से गुजरते हैं और उनके लिए भोजन की व्यवस्था भी उतनी ही आवश्यक है। इसी भावना से उन्होंने लोगों से प्रतिदिन “एक मुठ्ठी आटा” देने का आग्रह किया। घर-घर से एकत्रित होने वाला यह छोटा-सा सहयोग जरूरतमंदों के लिए भोजन का आधार बनने लगा। यहीं से सेवा का वह बीज बोया गया, जो आगे चलकर एक विशाल वटवृक्ष के रूप में विकसित हुआ।
नारायण सेवा संस्थान का उद्देश्य दिव्यांगजनों को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराकर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है। संस्थान में जन्मजात शारीरिक अक्षमताओं, दुर्घटनाओं अथवा अन्य कारणों से प्रभावित लोगों के लिए उपचार और सुधारात्मक सर्जरी की सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
उपचार के बाद जरूरतमंदों को कृत्रिम अंग एवं सहायक उपकरण उपलब्ध कराए जाते हैं, ताकि वे अपने दैनिक जीवन में अधिक स्वतंत्रता के साथ आगे बढ़ सकें। आधुनिक तकनीक के माध्यम से तैयार कृत्रिम अंग और कैलिपर्स इस पुनर्वास यात्रा को और प्रभावी बनाने में सहायक हैं। उदयपुर स्थित संस्थान का चिकित्सालय इस सेवा प्रकल्प का महत्वपूर्ण केंद्र है, जहां देश के विभिन्न हिस्सों से जरूरतमंद लोग उपचार के लिए पहुंचते हैं।
नारायण सेवा संस्थान का मानना है कि वास्तविक पुनर्वास तब पूरा होता है, जब व्यक्ति उपचार के साथ अपने जीवन को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ सके। इसी सोच के तहत संस्थान द्वारा कौशल विकास और व्यावसायिक प्रशिक्षण से जुड़ी गतिविधियां संचालित की जाती हैं। दिव्यांग एवं जरूरतमंद लोगों को उनकी क्षमता और रुचि के अनुसार सिलाई, कंप्यूटर और मोबाइल रिपेयरिंग जैसे विभिन्न कौशल प्रशिक्षण देकर रोजगार और स्वतंत्र जीवन की दिशा में आगे बढ़ने के अवसर प्रदान किए जाते हैं।
संस्थान सामाजिक पुनर्वास के क्षेत्र में सामूहिक विवाह का आयोजन करता है। अब तक दिव्यांग एवं निर्धन जोड़ों के लिए 47 सामूहिक विवाह आयोजित किए जा चुके हैं, जिनका उद्देश्य उन्हें सम्मानजनक पारिवारिक जीवन की ओर आगे बढ़ाना है।
दिव्यांगता किसी व्यक्ति की प्रतिभा की सीमा नहीं है। इसी विश्वास के साथ नारायण सेवा संस्थान दिव्यांगजनों को खेल और प्रतिभा प्रदर्शन के अवसर भी उपलब्ध कराता है। व्हीलचेयर क्रिकेट, ब्लाइंड क्रिकेट, पैरा तैराकी जैसी गतिविधियों के माध्यम से दिव्यांग खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच मिलता है। ऐसे आयोजन समाज में दिव्यांगजनों की क्षमताओं के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने में भूमिका निभाते हैं।
सेवा का एक महत्वपूर्ण आयाम शिक्षा भी है। संस्थान विशेष बच्चों के लिए शिक्षा की दिशा में कार्य करता है। मूक-बधिर एवं दृष्टिबाधित बच्चों के लिए शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ उनके समग्र विकास पर भी ध्यान दिया जाता है।
संस्थान द्वारा संचालित अंग्रेजी माध्यम डिजिटल स्कूल नारायण चिल्ड्रन एकेडमी में 796 से अधिक विद्यार्थी नि:शुल्क शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। आधुनिक डिजिटल संसाधनों से युक्त शिक्षा व्यवस्था बच्चों को बदलती दुनिया के साथ आगे बढ़ने के लिए तैयार करने का प्रयास है।
नारायण सेवा संस्थान की 41 वर्षों की यात्रा केवल वर्षों की गणना नहीं है। यह उन अनगिनत प्रयासों की कहानी है, जिनमें किसी को उपचार मिला, किसी को कृत्रिम अंग मिला, किसी बच्चे को शिक्षा का अवसर मिला, किसी दिव्यांग को कौशल मिला और किसी परिवार को अपने भविष्य की नई दिशा मिली।
संस्थान का लक्ष्य आज भी स्पष्ट है, जरूरतमंद दिव्यांगजनों को उपचार और पूर्ण पुनर्वास उपलब्ध कराना। आधुनिक तकनीक के माध्यम से कृत्रिम अंग प्रदान करना, कौशल विकास के जरिए आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना, खेलों के माध्यम से प्रतिभाओं को अवसर देना और समाज में समानता एवं सम्मान की भावना को मजबूत करना।
उदयपुर से शुरू हुई “एक मुठ्ठी आटे” की भावना आज सेवा के व्यापक संकल्प में बदल चुकी है। यह सेवा यात्रा हमें याद दिलाती है कि बदलाव हमेशा बड़े संसाधनों से नहीं, बल्कि एक छोटी-सी संवेदना और सेवा के सच्चे संकल्प से शुरू हो सकता है। नारायण सेवा संस्थान की 41 वर्षों की यात्रा इसी विश्वास का प्रमाण है कि जब सेवा में करुणा जुड़ती है, तो एक छोटी पहल भी अनेक जीवनों में नई आशा का आधार बन सकती है।
आप सभी को नारायण सेवा संस्थान के 42वें स्थापना दिवस की बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएं।