भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में दशहरा ऐसा पावन पर्व है, जो मनुष्य को सत्य, धर्म, मर्यादा और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। यह पर्व स्मरण कराता है कि अधर्म कितना भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे, अंततः विजय सत्य और धर्म की ही होती है। भगवान श्रीराम द्वारा रावण का वध और माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर का संहार, दोनों ही विजयादशमी के प्रमुख धार्मिक प्रसंग हैं।
यह दिन बुराई पर अच्छाई, असत्य पर सत्य और अन्याय पर न्याय की विजय का प्रतीक माना जाता है। साथ ही धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह दिन नई शुरुआत, शस्त्र पूजन और अपने कर्तव्यों के प्रति संकल्प लेने के लिए शुभ माना जाता है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, दशहरा या विजयादशमी का पर्व आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों तक माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना करने के बाद दसवें दिन विजयादशमी का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीराम की विजय और माँ दुर्गा की शक्ति का विशेष स्मरण किया जाता है।
इस बार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 20 अक्टूबर को पड़ रही है, इसलिए दशहरा 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा।
विजयादशमी पर शस्त्र पूजन और विजय मुहूर्त का विशेष धार्मिक महत्व है। 20 अक्टूबर 2026 को विजय मुहूर्त दोपहर 1:59 बजे से 2:45 बजे तक रहेगा। वहीं, अपराह्न काल में पूजा का समय दोपहर 1:14 बजे से 3:30 बजे तक बताया गया है। इस अवधि में शस्त्र पूजन तथा अन्य शुभ कार्य श्रद्धापूर्वक किए जा सकते हैं।
दशहरे की एक प्रमुख परंपरा रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतलों का दहन करना है। सूर्यास्त के बाद होने वाला रावण दहन अधर्म, अहंकार और बुराई के अंत तथा सत्य एवं धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है। अलग-अलग शहरों में रावण दहन का समय स्थानीय परंपराओं और आयोजन के अनुसार भिन्न हो सकता है। इसलिए सही समय जानने के लिए स्थानीय पंचांग या संबंधित आयोजन की आधिकारिक सूचना अवश्य देखें।
दशहरे का संबंध भगवान श्रीराम और रावण के बीच हुए धर्मयुद्ध से जुड़ा है। रामायण के अनुसार, लंकापति रावण ने छलपूर्वक माता सीता का हरण कर लिया था। माता सीता को रावण के बंधन से मुक्त कराने और अधर्म का अंत करने के लिए भगवान श्रीराम ने वानरराज सुग्रीव, पवनपुत्र हनुमान, जामवंत, अंगद और वानर सेना की सहायता से लंका पर चढ़ाई की।
लंका में भगवान श्रीराम और रावण के बीच भीषण युद्ध हुआ। रावण अत्यंत विद्वान, शक्तिशाली और अनेक विद्याओं का ज्ञाता था, लेकिन उसका अहंकार, अन्याय और अधर्म उसके पतन का कारण बने। अंततः भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर धर्म की स्थापना की और माता सीता को मुक्त कराया। इसी विजय की स्मृति में विजयादशमी मनाई जाती है।
विजयादशमी का एक अन्य प्रमुख धार्मिक प्रसंग माँ दुर्गा और महिषासुर से संबंधित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महिषासुर ने अपनी शक्ति के मद में देवताओं और समस्त लोकों को भयभीत कर दिया था। उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए देवताओं की दिव्य शक्तियों से माँ दुर्गा का प्राकट्य हुआ। माँ दुर्गा ने महिषासुर के साथ नौ दिनों तक युद्ध किया और दसवें दिन उसका संहार कर धर्म की रक्षा की। इस विजय को अधर्म पर दैवी शक्ति की विजय के रूप में देखा जाता है। शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में माँ दुर्गा की आराधना और दसवें दिन विजयादशमी का उत्सव इसी धार्मिक परंपरा से जुड़ा हुआ माना जाता है।
विजयादशमी केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि का अवसर है। रावण के दस सिरों को प्रतीकात्मक रूप से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और अन्याय जैसी बुराइयों से जोड़कर देखा जाता है। यह व्याख्या हमें अपने भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों को पहचानने और उनका त्याग करने की प्रेरणा देती है।
भगवान श्रीराम का जीवन मर्यादा, करुणा, सत्यनिष्ठा और कर्तव्यपालन का आदर्श प्रस्तुत करता है। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी धर्म की स्थापना का मार्ग नहीं छोड़ा। इसलिए दशहरा हमें अपने आचरण में सत्य, विनम्रता और सदाचार अपनाने का संदेश देता है। इस दिन हम सभी संकल्प लें कि अपने व्यवहार में मधुरता, स्वार्थ के स्थान पर सेवा और अहंकार के स्थान पर विनम्रता को स्थान देंगे।
भारतीय संस्कृति में पर्वों का आनंद तभी पूर्ण माना जाता है, जब उसमें दूसरों के जीवन में सुख बाँटने का भाव भी जुड़ा हो। विजयादशमी का अवसर हमें अपनी प्रसन्नता उन लोगों के साथ साझा करने की प्रेरणा देता है, जिन्हें जीवन में सहायता और अपनत्व की आवश्यकता है। इस दिन निर्धन परिवारों की सहायता करना और असहाय दिव्यांगजनों की सेवा करना पुण्यकारी कार्य माने जाते हैं।
अपनी सामर्थ्य के अनुसार आवश्यक सामग्री और भोजन का दान करके किसी के जीवन में आशा का संचार करें।
दशहरे का सबसे बड़ा संदेश यह है कि विजय केवल बाहरी शत्रुओं पर प्राप्त नहीं की जाती, बल्कि अपने भीतर की बुराइयों पर विजय पाना भी उतना ही आवश्यक है। रावण का अंत हमें उसके अहंकार की याद दिलाता है, जबकि भगवान श्रीराम का चरित्र सत्य, धैर्य और मर्यादा की शक्ति को प्रकट करता है।
यह पर्व हमें बताता है कि कठिनाइयों के समय भी सत्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। शक्ति का उपयोग दूसरों को दबाने के लिए नहीं, बल्कि उनकी रक्षा और सहायता के लिए होना चाहिए। ज्ञान के साथ विनम्रता, सफलता के साथ सदाचार और समृद्धि के साथ सेवा का भाव ही जीवन को सार्थक बनाता है।
इस विजयादशमी पर आइए, हम अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ और द्वेष का त्याग करने का संकल्प लें। अपने आचरण में करुणा, प्रेम, विनम्रता और सेवा को स्थान दें। पूजा-अर्चना के साथ जरूरतमंदों की सहायता करके पर्व की प्रसन्नता को और अर्थपूर्ण बनाएँ।
आप सभी को दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं।