होली की उल्लासपूर्ण छटा जब धीरे-धीरे शांत होने लगती है, रंगों की उन्मुक्त बौछार स्मृतियों में बस जाती है और वातावरण में अबीर-गुलाल की सुगंध शेष रह जाती है, तब सनातन परंपरा एक और पावन उत्सव का स्वागत करती है; जिसे हम लोग भाई दूज के नाम से जानते हैं। यह भाई-बहन के पवित्र और आत्मिक प्रेम का उत्सव है। होली जहाँ प्रेम के रंगों से जीवन को सराबोर करती है, वहीं भाई दूज उस प्रेम को आशीर्वाद और आत्मीयता के सूत्र में पिरो देता है।
भाई दूज को ‘भ्रातृ द्वितीया’ तथा ‘यम द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। ‘द्वितीया’ का अर्थ है चंद्र मास का दूसरा दिन, जो शुभ और मंगलकारी माना गया है। इस तिथि में भाई-बहन के प्रेम की विशेष ऊर्जा विद्यमान रहती है।
सनातन धर्म में बहन को मातृस्वरूपा कहा गया है। जिस प्रकार माता अपने पुत्र के कल्याण के लिए प्रार्थना करती है, उसी प्रकार इस दिन बहन अपने भाई के दीर्घायु और समृद्ध जीवन के लिए संकल्प लेती है। तिलक, अक्षत, रोली और दीप की ज्योति के माध्यम से वह अपने स्नेह और मंगलकामना को भाई के मस्तक पर अंकित करती है।
द्रिक पंचांग के अनुसार, चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि का आरंभ 4 मार्च 2026 की सायं 4 बजकर 48 मिनट से होगा और इसका समापन 5 मार्च 2026 की सायं 5 बजकर 03 मिनट पर होगा। सनातन परंपरा में ‘उदयातिथि’ को मान्यता दी जाती है, अतः वर्ष 2026 में होली भाई दूज का पर्व 5 मार्च, गुरुवार को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा।
भाई दूज की महिमा का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। इस पर्व से जुड़ी सर्वाधिक प्रसिद्ध कथा सूर्यपुत्र यमराज और उनकी बहन यमुना की है।
मान्यता है कि यमराज अपनी बहन यमुना से अत्यंत स्नेह करते थे, किंतु व्यस्तताओं के कारण वे लंबे समय तक उनसे मिल नहीं पाए। एक दिन यमुना ने अपने भाई को स्नेहपूर्वक आमंत्रित किया। चैत्र शुक्ल द्वितीया के दिन यमराज अपनी बहन के घर पहुँचे। यमुना ने उनका विधिपूर्वक स्वागत किया, तिलक लगाया, आरती उतारी और विविध पकवानों से उनका सत्कार किया।
बहन के प्रेम और आदर से अभिभूत होकर यमराज ने प्रसन्न होकर वरदान दिया, “जो भाई इस दिन अपनी बहन के घर जाकर तिलक ग्रहण करेगा, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा और वह सुख-समृद्धि प्राप्त करेगा।” तभी से यह पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम और रक्षा के प्रतीक के रूप में मनाया जाने लगा।
प्रातः स्नान के पश्चात बहनें पूजा की थाली सजाती हैं। उसमें हल्दी, अक्षत, दीपक और मिठाई रखी जाती है। शुभ मुहूर्त में भाई को आसन पर बैठाकर तिलक किया जाता है और आरती उतारी जाती है।
कुछ स्थानों पर विशेष मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। बहन भाई के कल्याण हेतु प्रार्थना करती है और उसके जीवन में सदैव धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष; चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति की कामना करती है।
इस दिन घरों में पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं, जिनमें गुजिया, मालपुआ, खीर, पूड़ी आदि प्रमुख हैं।
माथे पट टीका लगाने के बाद भाई अपनी बहन को उपहार देता है और उसके सुखमय जीवन की कामना करता है।
भाई दूज केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। यह भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और समर्पण का पावन उत्सव है। जब बहन अपने भाई के मस्तक पर तिलक लगाती है, तो वह उसके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का दीप प्रज्वलित करती है।
इस पावन भाई दूज पर हम अपने रिश्तों की इस मधुरता को हृदय से अनुभव करें। बहन का स्नेह और भाई का संरक्षण सदैव बना रहे; इसी मंगलकामना के साथ यह पावन पर्व हम सभी के जीवन में आनंद, आरोग्य और आध्यात्मिक उन्नति का प्रकाश भर दे।