सनातन धर्म में अनेक पर्व और उत्सव मनाए जाते हैं, लेकिन राम नवमी का महत्व अत्यंत विशेष है। यह वह दिव्य दिन है जब भगवान विष्णु ने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के रूप में पृथ्वी पर अवतार लिया। राम नवमी सत्य, धर्म, मर्यादा और आदर्श जीवन के सिद्धांतों का उत्सव है। इस दिन भारतवर्ष में भक्ति और उल्लास का वातावरण देखने को मिलता है। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है, घरों में भगवान श्रीराम की आराधना की जाती है और भक्तजन रामायण, रामचरितमानस तथा रामरक्षा स्तोत्र का पाठ करते हैं। इस दिन भक्त भगवान राम के बालरूप की पूजा करते हैं और उनका जन्मोत्सव अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं।
द्रिक पंचांग के अनुसार इस वर्ष राम नवमी का पावन पर्व 26 मार्च को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 26 मार्च को सुबह 11 बजकर 48 मिनट पर प्रारंभ होगी और 27 मार्च को सुबह 10 बजकर 6 मिनट पर समाप्त होगी। राम नवमी का मध्याह्न काल 26 मार्च को सुबह 11 बजकर 27 मिनट से लेकर दोपहर 1 बजकर 54 मिनट के बीच होगा। राम नवमी पर भगवान श्रीराम की पूजा के लिए मध्याह्न काल को विशेष महत्व दिया जाता है, कहा जाता है कि भगवान राम का जन्म मध्याह्न काल में ही हुआ था। इसलिए राम नवमी 26 मार्च को मनाई जाएगी।
राम नवमी सनातन धर्म में धर्म की सत्य की स्थापना का प्रतीक पर्व है। इस दिन अयोध्या नगरी में राजा दशरथ के घर भगवान विष्णु ने राम रूप में जन्म लिया था। शास्त्रों के अनुसार जब पृथ्वी अधर्म, अत्याचार और राक्षसी शक्तियों से पीड़ित हो गई थी, तब देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लिया।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार अयोध्या के राजा दशरथ के कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने अपने गुरु महर्षि वशिष्ठ के निर्देशानुसार पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया। यज्ञ की समाप्ति के बाद यज्ञकुंड से दिव्य खीर प्रकट हुई। कुंड से प्राप्त खीर को राजा दशरथ ने अपनी तीनों रानियों कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा को वितरित का दी। इसी खीर के प्रभाव से समय आने पर चार दिव्य पुत्रों का जन्म हुआ जिन्हें श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के नाम से जाना गया।
वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 18वें सर्ग में भगवान श्रीराम के जन्म का वर्णन इस प्रकार किया गया है-
ततो यज्ञसमाप्तेौ ऋतूनां षट्स्वत्यये।
ततः षण्मास्यतीते तु चैत्रे नावमिके तिथौ।।
अर्थात् पुत्रकामेष्टि यज्ञ की समाप्ति के बाद छह ऋतुएँ बीतने पर बारहवें महीने अर्थात् चैत्र मास की नवमी तिथि को, पुनर्वसु नक्षत्र में, जब ग्रह-नक्षत्र अत्यंत शुभ स्थिति में थे, तब माता कौशल्या ने सर्वलोकपूजित, दिव्य लक्षणों से युक्त भगवान श्रीराम को जन्म दिया।
भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। इसका अर्थ है वह पुरुष जो जीवन की मर्यादाओं और धर्म के नियमों का सर्वोत्तम पालन करता है। उन्होंने अपने जीवन में एक पुत्र, एक भाई, एक पति, एक मित्र और एक राजा के रूप में ऐसे आदर्श स्थापित किए जो युगों-युगों तक मानवता के लिए प्रेरणा बने रहेंगे।
वाल्मीकि रामायण में भगवान श्रीराम के बारे में कहा गया है-
रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः।
राजा सर्वस्य लोकस्य देवानाम् इव वासवः॥
अर्थात् भगवान श्रीराम धर्म के साकार स्वरूप हैं। उनका स्वभाव अत्यंत सज्जन है और उनका पराक्रम सत्य तथा न्याय पर आधारित है। जैसे देवताओं के राजा इन्द्र होते हैं, वैसे ही श्रीराम सभी लोकों के आदर्श राजा हैं।
राम नवमी के दिन भक्त विशेष रूप से मध्यान्ह काल में भगवान श्रीराम की पूजा करते हैं। पूजा विधि इस प्रकार है-
राम नवमी के दिन भगवान श्रीराम के बालरूप की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। कई स्थानों पर रामलला को पालने में झुलाया जाता है और मंदिरों में भव्य झाँकियाँ निकाली जाती हैं। साथ ही इस दिन घर के मुख्य द्वार पर धर्म ध्वजा लगाना अत्यंत शुभकारी माना जाता है।
भगवान श्रीराम की भक्ति जीवन में मर्यादा, अनुशासन और कर्तव्यपरायणता को स्थापित करने का मार्ग है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में भगवान के स्मरण के लिए लिखा है-
रामहि केवल प्रेमु पियारा। जानि लेहु जो जान निहारा।।
अर्थात् भगवान राम को केवल प्रेम प्रिय है। जो व्यक्ति सच्चे मन से प्रेम और भक्ति के साथ उनका स्मरण करता है, वे उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं।
राम नवमी का यह पावन पर्व हमें यह संदेश देता है कि जीवन में धर्म, सत्य और मर्यादा का पालन ही सच्चा मार्ग है। भगवान श्रीराम का जीवन मानवता के लिए एक आदर्श है, जो हमें कर्तव्य, त्याग, प्रेम और न्याय का मार्ग दिखाता है।
अंत में भगवान श्रीराम के चरणों में नतमस्तक होकर
लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥
अर्थात् जो समस्त लोकों को आनंद देने वाले हैं, युद्धभूमि में अत्यंत धैर्यवान और वीर हैं, जिनकी आँखें कमल के समान सुंदर हैं, जो रघुवंश के स्वामी हैं, जो करुणा के स्वरूप और दया के सागर हैं; ऐसे श्रीरामचन्द्र जी की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
जय श्री राम।