सनातन धर्म में अमावस्या तिथि स्वयं में ही अत्यंत आध्यात्मिक महत्व रखती है, और जब फाल्गुन अमावस्या के दिन सूर्य ग्रहण का दुर्लभ संयोग बनता है, तब इस तिथि की पुण्यता कई गुना बढ़ जाती है। शास्त्रों के अनुसार, ग्रहण काल को सामान्यतः साधना, जप और दान के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना गया है। यह समय आत्मशुद्धि, पाप नाश और ग्रह दोषों से मुक्ति का श्रेष्ठ अवसर होता है।
फाल्गुन अमावस्या त्याग, करुणा और सेवा का पर्व है, वहीं सूर्य ग्रहण इस दिन को और अधिक आध्यात्मिक बना देता है। ऐसी मान्यता है कि ग्रहण के समय वातावरण में उत्पन्न होने वाली नकारात्मक ऊर्जा को जप-तप, दान और सेवा के माध्यम से शांत किया जा सकता है।
फाल्गुन अमावस्या का महत्व
सनातन परंपरा में फाल्गुन अमावस्या को पितृ तर्पण, श्राद्ध और दान–पुण्य के लिए विशेष माना गया है। यह तिथि भगवान शिव की कृपा प्राप्ति और पितरों की शांति के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है। शास्त्रों में वर्णित है कि इस दिन श्रद्धा भाव से किया गया स्नान, जप, तर्पण और दान अक्षय पुण्य प्रदान करता है। फाल्गुन अमावस्या महाशिवरात्रि के समीप आती है, जिससे इसका शिव तत्व और अधिक प्रबल हो जाता है। इस दिन भगवान शिव की आराधना करने से व्यक्ति के जीवन के कष्ट दूर होते हैं और आत्मिक बल की प्राप्ति होती है।
सूर्य ग्रहण और दान का विशेष महत्व
शास्त्रों के अनुसार, सूर्य ग्रहण के दौरान दान का अत्यंत विशेष महत्व होता है। माना जाता है कि ग्रहण काल में किया गया दान सामान्य दिनों की अपेक्षा कई गुना फल देता है। यह दान-
नकारात्मक ऊर्जा को कम करता है।
पूर्व जन्मों और वर्तमान जीवन के पापों का नाश करता है।
ग्रह दोषों से मुक्ति दिलाता है।
आर्थिक, मानसिक और आध्यात्मिक समृद्धि प्रदान करता है।
पितरों को शांति और तृप्ति देता है।
फाल्गुन अमावस्या एवं सूर्य ग्रहण पर दान का संकल्प
इस पावन फाल्गुन अमावस्या एवं सूर्य ग्रहण के अवसर पर आप भी नारायण सेवा संस्थान के माध्यम से दीन-हीन, असहाय, दिव्यांग एवं जरूरतमंद बच्चों को भोजन कराने के सेवा प्रकल्प में सहभागी बनें और दान तथा सेवा के माध्यम से अपने जीवन को पुण्य से आलोकित करें।
आपके द्वारा दिए गए दान से जरूरतमंद दिव्यांग बच्चों को भोजन कराया जाएगा