सनातन धर्म में भगवान विष्णु के प्रत्येक अवतार का अपना विशिष्ट महत्व है। उन्हीं दिव्य अवतारों में भगवान परशुराम का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी, उग्र और धर्मरक्षक माना गया है। भगवान परशुराम को श्रीहरि विष्णु का छठा अवतार माना जाता है, जिन्होंने पृथ्वी पर बढ़ते अधर्म, अन्याय और दुष्ट शक्तियों के विनाश के लिए अवतार धारण किया था। उनके हाथ में धारण किया गया फरसा उनकी वीरता, पराक्रम और धर्म की रक्षा के संकल्प का प्रतीक है।
यह पावन पर्व अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर आता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान परशुराम का स्मरण और भगवान विष्णु की आराधना करने से साधक को अद्भुत आत्मबल, साहस और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भगवान परशुराम का अवतरण दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 में इस हिसाब से परशुराम जयंती 19 अप्रैल दिन रविवार को मनाई जाएगी।
तृतीया तिथि प्रारंभ : 19 अप्रैल 2026, प्रातः 10:49 बजे
तृतीया तिथि समाप्त : 20 अप्रैल 2026, प्रातः 07:27 बजे
प्रातःकालीन पूजा मुहूर्त : सुबह 7:29 बजे से दोपहर 12:20 बजे तक
सायंकालीन पूजा मुहूर्त : शाम 6:49 बजे से रात्रि 10:57 बजे तक
पुराणों के अनुसार भगवान परशुराम का जन्म माता रेणुका के गर्भ से और महर्षि जमदग्नि के कुल में हुआ था। स्कंद पुराण में उल्लेख मिलता है कि वैशाख शुक्ल तृतीया के पावन दिन उन्होंने पृथ्वी पर अवतार लिया। इसी कारण अक्षय तृतीया के दिन परशुराम जयंती का पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
भगवान परशुराम का जन्म धर्म की पुनर्स्थापना और अत्याचार के अंत के लिए हुआ था। जब पृथ्वी पर अन्याय और अधर्म अपने चरम पर था, तब श्रीहरि ने अपने इस रौद्र स्वरूप से धरती पर दुष्ट शक्तियों का संहार किया।
विद्वानों के अनुसार उनकी जन्मस्थली को लेकर भिन्न मत हैं, किंतु मध्य प्रदेश के इंदौर के समीप स्थित जानपाव पर्वत को अधिकांश लोग उनकी जन्मभूमि मानते हैं।
भगवान परशुराम सप्त चिरंजीवियों में से एक माने जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि वे आज भी दिव्य रूप में विद्यमान हैं और धर्म की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।
उनका स्वरूप अत्यंत उग्र और तेजस्वी है। इसी कारण सामान्य व्यक्ति के लिए उनकी प्रत्यक्ष मूर्ति पूजा करना आसान नहीं होता। मान्यता है कि उनकी ऊर्जा अत्यंत प्रबल होती है, जिसे साधारण साधक ग्रहण नहीं कर सकता। इसलिए सामान्य तौर पर भगवान परशुराम की पूजा नहीं की जाती है। जबकि कुछ विशेष अवसरों पर भगवान परशुराम की पूजा विधि विधान से करना पुण्यदायी माना जाता है।
जो लोग जीवन में साहस, अनुशासन और जोखिम भरे कार्यों से जुड़े होते हैं, उनके लिए भगवान परशुराम की आराधना विशेष फलदायी मानी जाती है। ऐसे लोगों को परशुराम जयंती पर पूजा अवश्य करना चाहिए। जो लोग सुरक्षा बल के रूप में कार्यरत हैं या पुलिस और सेना में या विद्यार्थी हैं या किसी नेतृत्वकारी भूमिका में हैं; ऐसे लोग भगवान परशुराम की पूजा अवश्य करें।
परशुराम जयंती पर भगवान परशुराम की पूजा करने से व्यक्ति के भीतर निर्भीकता, स्पष्ट सोच और संघर्षों से लड़ने की शक्ति विकसित होती है।
इस पावन दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें। लड़के पे पाटे पर भगवान परशुराम का चित्र रखें। भगवान परशुराम का ध्यान करें। ध्यान करते हुए भगवान विष्णु की पूजा करें और उन्हें पीले पुष्प, चंदन, तुलसी दल, धूप, दीप और मिठाई अर्पित करें।
पूजन के समय निम्न मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जाप करें:
ॐ परशुरामाय नमः।
ॐ ब्रह्मक्षत्राय विद्महे क्षत्रियान्ताय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात्।
ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि तन्नो परशुराम प्रचोदयात्।
अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती के दिन दान का अत्यंत महत्व होता है। इस दिन अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान अवश्य करना चाहिए।
इस दिन विशेष रूप से इन वस्तुओं का दान शुभ माना गया है:
मान्यता है कि इस दिन किया गया दान अक्षय पुण्य प्रदान करता है।
भगवान परशुराम की आराधना से साधक को अनेक आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं।
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: परशुराम जयंती 2026 कब है?
उत्तर: परशुराम जयंती 19 अप्रैल, रविवार को मनाई जाएगी।
प्रश्न: परशुराम जयंती किन भगवान से संबंधित है?
उत्तर: परशुराम जयंती भगवान परशुराम से संबंधित है। जिन्हें भगवान विष्णु की छठा अवतार माना जाता है।
प्रश्न: परशुराम जयंती पर क्या दान करना चाहिए?
उत्तर: इस दिन मटका, जल, अन्न, सत्तू, गुड़, खरबूजा, तरबूज और अन्य शीतल फल दान करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।