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अक्षय तृतीया का अर्थ है, जिसका फल अक्षय रहे, अर्थात कभी समाप्त न हो। इस दिन किया गया जप, तप और दान अक्षय फल प्रदान करता है। यह दिन सुख, सौभाग्य और आरोग्य की प्राप्ति का स्वर्णिम द्वार है।
सनातन परंपरा के धर्मग्रंथों के अनुसार वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि यानी अक्षय तृतीया स्वयं सिद्ध मुहूर्त है यह वह पावन दिन है, जिस दिन अर्जित किया गया पुण्य कभी क्षय नहीं होता मान्यता है कि इसी दिन सतयुग और त्रेतायुग का प्रारंभ हुआ था और श्रीहरि के छठवें अवतार भगवान परशुराम का इस धरती पर अवतरण भी हुआ था।
महापर्व का महत्व अक्षय तृतीया का अर्थ है, जिसका फल अक्षय रहे, अर्थात कभी समाप्त न हो इस दिन किया गया जप, तप और दान अक्षय फल प्रदान करता है यह दिन सुख, सौभाग्य और आरोग्य की प्राप्ति का स्वर्णिम द्वार है।
दान-पुण्य का अक्षय फल अक्षय तृतीया पर किया गया दान भक्त के संचित पापों का नाश करता है धार्मिक मान्यता है कि इस दिन ब्राह्मणों तथा जरूरतमंदों को जल से भरे कलश, सत्तू, गुड़, फल, अन्न और भोजन का दान करना चाहिए। इससे दान देने वाले साधक के जीवन में सुख, सौभाग्य और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है और कुल में शांति बनी रहती है।
“ददाति प्रतिगृह्णाति” अर्थात् इस दिन श्रद्धा भाव से दिया गया दान इस जन्म में सुख और परलोक में सद्गति प्रदान करने वाला होता है।
आपके द्वारा दिए गए दान से दीन-हीन, असहाय, जरूरतमंद, दिव्यांग बच्चों को भोजन कराया जाएगा।
इस अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर नारायण सेवा संस्थान दीन-हीन, असहाय, निर्धन और दिव्यांग बच्चों को मीठा भोजन करवा रहा है। आप भी इस पुण्यदायी अनुष्ठान में सहभागी बनें और तन-मन-धन से इस दिव्य सेवा प्रकल्प में योगदान देकर अक्षय पुण्य प्राप्त करें।
39,658,326 रोगी भोजन सेवा
450,554 सुधारात्मक सर्जरी संपन्न
395,728 कैलिपर्स वितरित
38,780 कृत्रिम अंग वितरित