सनातन परंपरा में माघ मास को तप, त्याग और आत्मशुद्धि का श्रेष्ठ काल माना गया है। माघ मास के पुण्यकारी समय में जब गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती की पावन धाराएँ प्रयागराज में मिलती हैं, तब यही त्रिवेणी संगम कल्पवास जैसी दिव्य साधना का केंद्र बन जाता है। कल्पवास केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन को भीतर से बदल देने वाली आध्यात्मिक यात्रा है।
‘कल्पवास’ का शाब्दिक अर्थ है, एक निश्चित काल तक संयम, नियम और साधना के साथ तीर्थ क्षेत्र में निवास करना। माघ मास में संगम तट पर रहकर वेदपाठ, जप-तप, ध्यान, पूजा और सेवा में जीवन को समर्पित करना ही कल्पवास कहलाता है। शास्त्रों में वर्णित है कि सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ आरंभ होने वाला यह एक मास, साधक को असंख्य पुण्यों का अधिकारी बना देता है। मान्यता है कि माघ में किया गया एक माह का कल्पवास, परमपिता ब्रह्मा के एक कल्प के समान पुण्य प्रदान करता है।
परंपरानुसार कल्पवास पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से आरंभ होकर माघ शुक्ल द्वादशी तक किया जाता है। अनेक श्रद्धालु मकर संक्रांति से भी इसका आरंभ करते हैं। इस अवधि में साधक संगम तट पर निवास करते है, सीमित साधनों में जीवन यापन करता है और आत्मसंयम के साथ धार्मिक कर्तव्यों का पालन करता है। मान्यता है कि माघ मास में संगम के सान्निध्य में रहकर किया गया तप मनुष्य के जीवन को आध्यात्मिक ऊँचाइयों तक ले जाता है।
कल्पवास को आत्मोन्नति का साधन माना गया है। कहा जाता है कि जो साधक पूर्ण श्रद्धा और नियमों के साथ कल्पवास करता है, उसे न केवल मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है, बल्कि जन्म-जन्मांतर के बंधनों से मुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त होता है। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि सौ वर्षों तक निराहार तपस्या करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य केवल माघ मास में कल्पवास से सहज ही प्राप्त हो जाता है।
कल्पवास में साधक सादा जीवन अपनाते है। श्वेत या पीत वस्त्र धारण किए जाते हैं, सात्विक भोजन लिया जाता है और विलासिता से पूर्णतः दूरी बनाई जाती है। शास्त्रों के अनुसार कल्पवास की अवधि एक रात्रि से लेकर आजीवन भी हो सकती है; यह साधक की श्रद्धा, सामर्थ्य और संकल्प पर निर्भर करता है।
पद्म पुराण में महर्षि दत्तात्रेय द्वारा कल्पवास के नियमों का विस्तार से वर्णन किया गया है। पद्म पुराण में लिखा है-
प्रयागे माघ पर्यन्त त्रिवेणी संगमे शुभे।
निवासः पुण्यशीलानां कल्पवासो हि कश्यते॥
तीर्थराज प्रयाग के त्रिवेणी संगम पर माघ महीने में निवास करने से पुण्य फल प्राप्त होता है। संगम तट पर एक माह की इस साधना को ‘कल्पवास’ कहा गया है।
परंपरा के अनुसार कल्पवास करने वाले साधक को 21 नियमों का पालन करना होता है, जिनमें प्रमुख हैं—
इन सभी नियमों में ब्रह्मचर्य, व्रत, उपवास, देवपूजन, सत्संग और दान को विशेष महत्व दिया गया है।
कल्पवास के प्रथम दिन तुलसी और शालिग्राम की स्थापना कर विधिपूर्वक पूजन किया जाता है। साधक अपने निवास स्थान के समीप जौ के बीज भी बोता है, जो साधना की पूर्णता का प्रतीक माने जाते हैं। अवधि पूर्ण होने पर जौ के पौधे को श्रद्धा के साथ ले जाया जाता है और तुलसी को गंगा में विसर्जित किया जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि कल्पवास से न केवल आत्मा का शोधन होता है, बल्कि शरीर और मन भी सात्विक ऊर्जा से परिपूर्ण हो जाते हैं। पुराणों में कहा गया है कि देवता भी मानव जन्म की कामना इसलिए करते हैं ताकि प्रयाग में कल्पवास कर सकें। महाभारत के अनुसार, जो व्यक्ति माघ मास में इंद्रियों को संयम में रखकर संगम पर स्नान, ध्यान और कल्पवास करता है, उसके लिए स्वर्गलोक का द्वार स्वतः खुल जाता है।
कल्पवास आत्मा के शुद्धिकरण की दिव्य प्रक्रिया है। यह साधना मनुष्य के अंतःकरण और शरीर दोनों का कायाकल्प कर देती है। माघ मास में त्रिवेणी संगम पर किया गया कल्पवास जीवन को धर्म, संयम और मोक्ष के पथ पर अग्रसर करता है।