भारतीय सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं में गुरु को भगवान से भी उच्च स्थान दिया गया है। गुरु की इसी महत्ता, वंदना और उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का पावन पर्व है गुरु पूर्णिमा। यह पावन उत्सव प्रतिवर्ष आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को पूरे देश में अपार श्रद्धा, उल्लास और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
श्रावण मास के आगमन से ठीक पहले आने वाली यह पूर्णिमा शिष्य के जीवन में ज्ञान के सूर्य के उदय होने का महापर्व है। इस दिन अपने गुरु का पूजन और आशीर्वाद ग्रहण करने से जीवन में सफलता और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
गुरु पूर्णिमा को ‘व्यास पूर्णिमा’ के नाम से भी जाना जाता है। इसी पावन तिथि पर चारों वेदों के संकलनकर्ता, महाभारत, अठारह पुराणों और श्रीमद्भागवत महापुराण जैसे महान ग्रंथों के रचयिता महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी का अवतरण हुआ था। महर्षि व्यास को मानव जाति का जगत गुरु माना जाता है, जिन्होंने बिखरे हुए ज्ञान को सुव्यवस्थित करके लोक कल्याण के लिए ग्रंथों संकलित किया।
द्रिक पंचांग के अनुसार साल 2026 में गुरु पूर्णिमा का पर्व 29 जुलाई को मनाया जाएगा। पूर्णिमा तिथि का प्रारम्भ 28 जुलाई 2026 को शाम 6 बजकर 18 मिनट पर होगा। वहीं समापन 29 जुलाई 2026 को शाम 8 बजकर 5 मिनट पर होगा। चूँकि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में सूर्योदय और तिथि के अंशों के अनुसार समय में आंशिक भिन्नता होती है, इसलिए व्रत, स्नान-दान और गुरु पूजन के सटीक व शुभ मुहूर्त के लिए अपने स्थानीय पंचांग अथवा सनातन कैलेंडर का अवलोकन करना अत्यंत श्रेयस्कर रहेगा।
सनातन धर्म के ग्रंथों में गुरु के स्वरूप को साक्षात परब्रह्म के तुल्य माना गया है। ‘गुरु’ शब्द दो अक्षरों के मेल से बना है। ‘गु’ का अर्थ होता है अंधकार या अज्ञान और ‘रु’ का अर्थ होता है प्रकाश। अर्थात् जो आत्मा को अज्ञानता के घोर अंधकार से निकालकर दिव्य ज्ञान के परम प्रकाश की ओर ले जाए, वही गुरु है।
शास्त्रों में गुरु की वंदना करते हुए कहा गया है:
अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया ।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
अर्थात् जो मनुष्य अज्ञान रूपी अंधकार के कारण अंधा हो चुका है, उसके नेत्रों में ज्ञान रूपी काजल की शलाका (सलाई) लगाकर जिसके द्वारा विवेक की आँखें खोल दी जाती हैं, ऐसे परम कल्याणकारी गुरुदेव के चरणों में मैं कोटि-कोटि नमन करता हूँ।
हमारे वेदों, उपनिषदों और संत परंपरा में गुरु को ईश्वर से भी बढ़कर माना गया है, क्योंकि ईश्वर का साक्षात्कार कराने का मार्ग भी गुरु ही प्रशस्त करते हैं।
त्रिदेव स्वरूप गुरु वंदना: स्कंद पुराण की गुरु गीता में भगवान शिव माता पार्वती को गुरु का महत्व समझाते हुए कहते हैं कि गुरु ही सृष्टि के रचयिता, पालनकर्ता और संहारक के प्रतीक हैं:
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
अर्थात् गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं और गुरु ही भगवान शंकर हैं। गुरु ही साक्षात परब्रह्म (परमेश्वर) हैं, ऐसे महान गुरुदेव को मेरा सादर प्रणाम है।
साधना का मूल आधार: गुरु का ध्यान और उनके वचनों का पालन ही शिष्य की सबसे बड़ी साधना है।
शास्त्रों में कहा गया है:
ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम् ।
मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ॥
अर्थात् ध्यान का मूल आधार गुरु का स्वरूप है, पूजा का मूल आधार गुरु के चरण कमल हैं, मंत्र का मूल आधार गुरु के मुख से निकले वचन हैं, और मोक्ष की प्राप्ति का मूल आधार गुरु की असीम कृपा है।
भारतीय ग्रंथ और पुराण ऐसे प्रसंगों से भरे पड़े हैं जहाँ गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण ने साधारण मनुष्यों को अमर बना दिया:
संपूर्ण भारतवर्ष में गुरु पूर्णिमा के इस पावन पर्व पर आश्रमों, मंदिरों और घरों में गुरुभक्ति का अद्भुत वातावरण दिखाई देता है। गुरु पूर्णिमा उत्सव की पारंपरिक विधि इस प्रकार है:
आज के आधुनिक युग में भले ही आज प्राचीन काल की ‘गुरुकुल पद्धति’ का स्वरूप बदल गया हो, लेकिन गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना आज भी उतनी ही शाश्वत है। आज हमारे शिक्षक, माता-पिता, मार्गदर्शक और हमें सही राह दिखाने वाले प्रेरणादायक व्यक्तित्व भी गुरु की श्रेणी में आते हैं। आधुनिक जीवन की भागदौड़ और मानसिक तनाव के बीच एक सच्चे मार्गदर्शक की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है, जो हमें नैतिक मूल्यों, सत्य और भलाई के मार्ग पर अग्रसर रख सके।
शिष्य और गुरु के बीच का संबंध कैसा होना चाहिए, इसका सर्वोत्तम उदाहरण हमें उपनिषदों के शांति पाठ में मिलता है, जिसे इस दिन विशेष रूप से दोहराया जाता है
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शांति, शांति, शांतिः
अर्थात् हे परमेश्वर! आप हम गुरु और शिष्य दोनों की एक साथ रक्षा करें। हम दोनों का साथ-साथ पालन-पोषण करें। हम दोनों एक साथ मिलकर विद्या प्राप्ति का पुरुषार्थ और सामर्थ्य अर्जित करें। हमारी सीखी हुई विद्या ओजस्वी और तेजस्वी हो और हम दोनों के बीच कभी कोई द्वेष या कटुता न आए। चारों ओर शांति का वास हो।
गुरु पूर्णिमा का उत्सव आत्म-मंथन करने का दिन है। यह पर्व हमें बताता है कि जीवन में कितनी भी भौतिक उन्नति कर लें, लेकिन बिना सही मार्गदर्शन और नैतिक मूल्यों के हमारा जीवन दिशाहीन है। गुरु की छत्रछाया में ही मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर विनम्रता सीखता है और अपने जीवन को सार्थक बनाता है।
आइए, इस पावन गुरु पूर्णिमा पर हम अपने जीवन के सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष गुरुओं का स्मरण करें, उनके प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता व्यक्त करें और उनके द्वारा दिखाए गए सत्य, करुणा और ज्ञान के मार्ग पर चलने का सच्चा प्रयास करें।