सनातन धर्म में एकादशी तिथि को पापों से मुक्ति और पुण्य-संचय का श्रेष्ठ साधन माना गया है। इन्हीं पावन तिथियों में विजया एकादशी का स्थान अत्यंत पुण्यदायी और कल्याणकारी है। यह एकादशी फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में आती है और भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित होती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा-भाव से किया गया व्रत, जप, तप और सेवा मनुष्य के जीवन में आने वाली समस्त बाधाओं को दूर कर विजय का मार्ग प्रशस्त करता है।
विजया एकादशी का महत्व
विजया एकादशी का व्रत जीवन में विजय, सफलता और मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, इस एकादशी के पुण्य से साधक शत्रु-बाधाओं, भय और पापों से मुक्त होता है तथा प्रत्येक कार्य में सफलता प्राप्त करता है। पौराणिक कथाओं में उल्लेख मिलता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने भी लंका विजय से पूर्व विजया एकादशी का व्रत किया था। इस व्रत के प्रभाव से ही उन्हें रावण पर विजय और धर्म की स्थापना का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
यह एकादशी न केवल सांसारिक विजय देती है, बल्कि आत्मिक उत्थान और जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति का भी मार्ग प्रशस्त करती है।
दान और सेवा का आध्यात्मिक महत्व
एकादशी केवल उपवास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सेवा, करुणा और परोपकार की प्रेरणा देने वाला पर्व है। शास्त्रों में कहा गया है कि एकादशी के दिन किया गया अन्नदान, वस्त्रदान और भोजन सेवा अक्षय पुण्य प्रदान करती है। विशेष रूप से जरूरतमंद, असहाय और दिव्यांगजनों को भोजन कराना भगवान विष्णु की सच्ची आराधना के समान माना गया है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥
अर्थात्—यज्ञ, दान और तप को कभी नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि ये कर्म मनुष्य को पवित्र और पुण्यवान बनाते हैं।
विजया एकादशी पर भोजन सेवा का पुण्य
विजया एकादशी के इस पावन अवसर पर नारायण सेवा संस्थान के माध्यम से दीन-हीन, असहाय एवं दिव्यांग बच्चों को भोजन कराकर आप भी इस पुण्यदायी सेवा के सहभागी बन सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि एकादशी पर भूखे को भोजन कराने से भगवान श्रीहरि स्वयं प्रसन्न होते हैं और दाता को जीवन में यश, वैभव और विजय का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।