सनातन धर्म में पितृ पक्ष को अपने पूर्वजों के पावन स्मरण, श्रद्धा और कृतज्ञता अर्पित करने का विशेष काल माना गया है। इस अवधि में तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और दान-पुण्य के माध्यम से पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट की जाती है। पितृ पक्ष की अंतिम तिथि सर्व पितृ अमावस्या कहलाती है, जिसे पितरों के निमित्त श्रद्धा अर्पित करने की अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि माना गया है।
सर्व पितृ अमावस्या का दिन उन सभी पितरों के स्मरण और उनके निमित्त पुण्य कर्म करने के लिए समर्पित माना जाता है, जिनकी श्राद्ध तिथि ज्ञात न हो या जिनका श्राद्ध किसी कारणवश न हो पाया हो। इस दिन श्रद्धापूर्वक किए गए तर्पण, श्राद्ध और दान को विशेष फलदायी माना गया है।
सर्व पितृ अमावस्या पितृ पक्ष का समापन दिवस है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन अपने पूर्वजों का श्रद्धापूर्वक स्मरण कर तर्पण, श्राद्ध और दान करने से पितरों के प्रति कर्तव्य पूर्ण करने का भाव प्रकट होता है। यह तिथि केवल कर्मकांड का अवसर नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पावन पर्व है। जीवन में हमें जो संस्कार, परिवार और परंपराएं प्राप्त हुई हैं, उनके प्रति आभार प्रकट करते हुए इस दिन जरूरतमंदों की सेवा करना भी पुण्यकारी माना गया है।
सर्व पितृ अमावस्या हमें यह संदेश देती है कि श्रद्धा केवल स्मरण में नहीं, बल्कि सेवा, करुणा और परोपकार के कर्मों में भी प्रकट होनी चाहिए। इसलिए इस पावन अवसर पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान और सेवा का संकल्प लें।
सनातन परंपरा में दान को पुण्य और परोपकार का श्रेष्ठ माध्यम माना गया है। पितृ पक्ष में अपने पूर्वजों के निमित्त किया गया दान श्रद्धा और सेवा की भावना से जुड़ा होता है। दान करते समय मन में अहंकार नहीं, बल्कि श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। ईश्वर ने हमें जो सामर्थ्य प्रदान की है, उसमें से किसी जरूरतमंद के जीवन में अन्न, आशा और प्रसन्नता का संचार करना भी एक सेवा है।
गरुड़ पुराण के प्रेत कल्प (धर्म कांड) में पितृ पक्ष पर किए गए दान के बारे में कहा गया है-
अर्थात् पितरों ने निमित्त श्राद्ध आदि करने से मनुष्य को लंबी आयु, संतान, यश, स्वर्ग, कीर्ति, स्वास्थ्य, बल, ऐश्वर्य, पशुधन, सुख और धन-धान्य की प्राप्ति होती है।
सर्व पितृ अमावस्या के दिन अन्न, भोजन, वस्त्र और आवश्यकता की वस्तुओं का दान अपनी सामर्थ्य के अनुसार करें। विशेष रूप से जरूरतमंद, निर्धन और दिव्यांग जनों की सेवा कर इस पावन तिथि को सार्थक बनाएं।
अन्न को सनातन परंपरा में जीवन का आधार और भोजन सेवा को श्रेष्ठ परोपकारों में माना गया है। किसी भूखे के जीवन में भोजन पहुंचाना केवल दान नहीं, बल्कि मानव सेवा का पावन अवसर है।
इस सर्व पितृ अमावस्या पर अपने पूर्वजों के पावन स्मरण में नारायण सेवा संस्थान के दीन-दुःखी, निर्धन और दिव्यांग बच्चों के लिए भोजन सेवा में सहयोग करें। अपने पूर्वजों की स्मृति को सेवा का संकल्प बनाएं। श्रद्धा से भोजन सेवा करें और जरूरतमंद बच्चों के जीवन में स्नेह, संतोष और प्रसन्नता का दीप जलाएं।
पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करें, सेवा का संकल्प लें और सर्व पितृ अमावस्या के इस पावन अवसर को मानव सेवा के लिए समर्पित करें।
आपके द्वारा दिए गए दान से दिव्यांग बच्चों को भोजन कराया जाएगा