ज्येष्ठ अधिक अमावस्या सनातन धर्म में अत्यंत पुण्यदायी और कल्याणकारी तिथि मानी जाती है। यह पावन तिथि भगवान विष्णु के प्रिय मास पुरुषोत्तम मास में आती है, इसलिए इस तिथि का धार्मिक महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह पावन दिन पितरों के स्मरण, भगवान श्रीहरि विष्णु एवं भगवान शिव की उपासना, स्नान-दान, जप-तप और सेवा के लिए विशेष फलदायी माना गया है। पुरुषोत्तम मास में आने वाली यह अमावस्या आत्मशुद्धि, भक्ति और मानव सेवा के माध्यम से जीवन में सुख और शांति का संचार करने का दिव्य अवसर प्रदान करती है।
शास्त्रों के अनुसार अमावस्या तिथि पर श्रद्धा और समर्पण भाव से भगवान का स्मरण, व्रत, पूजा-अर्चना, दीपदान एवं जरूरतमंदों की सेवा करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि इस पावन अवसर पर किया गया दान और सत्कर्म जीवन के कष्टों को दूर कर सुख-समृद्धि एवं आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
ज्येष्ठ अधिक अमावस्या का महत्व
धार्मिक ग्रंथों में ज्येष्ठ अधिक अमावस्या को दीन-हीन, असहाय लोगों के लिए दान-पुण्य और सेवा हेतु अत्यंत शुभ तिथि बताया गया है। इस दिन पवित्र स्नान, अन्नदान, जलसेवा एवं दीन-हीन, असहाय, निर्धन और दिव्यांग जनों की सहायता करना विशेष पुण्यदायी माना जाता है। मान्यता है कि श्रद्धा भाव से किया गया सेवा कार्य भगवान विष्णु और पितृजनों की कृपा प्रदान करता है तथा परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का संचार करता है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने सात्विक दान का महत्व बताते हुए कहा है-
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥
अर्थात जो दान बिना किसी स्वार्थ, दिखावे या फल की इच्छा के, उचित समय पर योग्य व्यक्ति को केवल कर्तव्य समझकर दिया जाए, वही सात्विक दान कहलाता है।
ज्येष्ठ अधिक अमावस्या पर सेवा का पुण्य अवसर
इस पावन ज्येष्ठ अधिक अमावस्या पर दान देकर दीन-हीन, असहाय, जरूरतमंद एवं दिव्यांग बच्चों की भोजन सेवा में सहयोग करें और भगवान श्रीहरि विष्णु की कृपा प्राप्त करें।
इस पुण्यमयी अवसर पर सेवा, दान और भक्ति के माध्यम से अपने जीवन को पुण्य, सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा से आलोकित करें।