सनातन धर्म में अमावस्या तिथियों का विशेष आध्यात्मिक महत्व बताया गया है। इन्हीं में मौनी अमावस्या, जो माघ मास में पड़ती है, अत्यंत पुण्यदायी मानी गई है। यह दिन मौन साधना, आत्मसंयम, तप और सेवा का प्रतीक है। शास्त्रों के अनुसार, इस पावन तिथि पर मौन धारण कर भगवान विष्णु का स्मरण करने से मन की चंचलता शांत होती है और आत्मा शुद्ध होती है।
सनातन परंपरा में मौनी अमावस्या का दिन आत्मचिंतन और ईश्वर से जुड़ने का श्रेष्ठ अवसर माना गया है। मान्यता है कि इस दिन मौन व्रत, जप-तप और स्नान-दान करने से व्यक्ति के जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश होता है तथा उसे मानसिक शांति, पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
मौनी अमावस्या का पौराणिक महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मौनी अमावस्या के दिन मनु महाराज ने मौन धारण कर कठोर तपस्या की थी, जिससे यह तिथि “मौनी” कहलायी। यह दिन विशेष रूप से हरि स्मरण, मौन साधना और दान-पुण्य के लिए श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन किया गया जप, तप, स्नान और दान अक्षय फल देने वाला होता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि मौनी अमावस्या पर मौन रखकर भगवान विष्णु का ध्यान करने से मनुष्य के सभी कष्टों का निवारण होता है और उसके मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
दान, सेवा और मौन साधना का महत्व
मौनी अमावस्या केवल मौन व्रत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह करुणा, सेवा और परोपकार का भी महापर्व है। इस दिन ब्राह्मणों तथा दीन-दु:खी, जरूरतमंद, असहाय, दिव्यांग बच्चों को भोजन दान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
धार्मिक ग्रंथों में दान और सेवा को श्रेष्ठ कर्म बताया गया है। दान का उल्लेख करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा है-
तुलसी पंछी के पिये घटे न सरिता नीर ।
दान दिये धन न घटे, जो सहाय रघुवीर ।।
अर्थात् जिस तरह पक्षियों के पानी पीने से नदी का जल कम नहीं होता, उसी तरह अगर भगवान राम (रघुवीर) का सहारा हो, तो दान करने से घर में कभी भी धन की कमी नहीं होती।
मौनी अमावस्या दान करें
इस पावन मौनी अमावस्या पर नारायण सेवा संस्थान के दीन-हीन, असहाय, दिव्यांग एवं जरूरतमंद बच्चों भोजन कराने के सेवा प्रकल्प में सहभागी बनकर अपने जीवन को पुण्य से आलोकित करें।