सनातन परंपरा में अमावस्या तिथि को पितृस्मरण और सेवा का दिव्य अवसर माना गया है। चैत्र मास की अमावस्या विशेष रूप से पितरों की शांति और सद्गति के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है। यह वह पावन काल है जब श्रद्धा और दान के माध्यम से हम अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और उनके आशीर्वाद की कामना करते हैं।
आध्यात्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अमावस्या के दिन पितृलोक के द्वार सूक्ष्म रूप से पृथ्वी के समीप होते हैं। इस तिथि पर श्रद्धा से किया गया श्राद्ध और दान पितरों की आत्मा को शांति प्रदान करता है। शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति अमावस्या के दिन तिल, जल और कुश से पितरों का तर्पण करता है, उसके जीवन से बाधाएं और मानसिक क्लेश दूर होते हैं। घर में सुख-समृद्धि और शांति का वास होता है।
दान का पुण्यफल
धार्मिक ग्रंथों में अमावस्या के दिन दान का विशेष महत्व बताया गया है। अन्न, वस्त्र, तिल, गुड़, दक्षिणा तथा जरूरतमंदों को भोजन कराने से विशेष पुण्यफल की प्राप्ति होती है।
सनातन परंपरा के कई ग्रंथों में दान के महत्व के बारे में विस्तार से बताया गया है। दान के महत्व का उल्लेख करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है-
तुलसी पंछी के पिये, घटे न सरिता नीर ।
दान दिये धन ना घटे, जो सहाय रघुवीर ।।
अर्थात् जिस तरह पक्षियों के पानी पीने से विशाल नदी का पानी कम नहीं होता, उसी प्रकार यदि सहायता करने वाले स्वयं भगवान श्री राम (रघुवीर) हों तो सच्चे मन से दान करने वाले के घर धन की कभी कमी नहीं होती।
जरूरतमंद दिव्यांग बच्चों को कराएं भोजन
चैत्र अमावस्या के पावन अवसर पर नारायण सेवा संस्थान के दीन-हीन, असहाय, दिव्यांग बच्चों को भोजन कराने के सेवा प्रकल्प में सहयोग करें और अपने जीवन को श्रद्धा और भक्ति के धार्मिक कर्म के साथ आध्यात्मिक उन्नति से आलोकित करें।