पौष पूर्णिमा हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह हर साल पौष मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है।
इस दिन जरूरतमंदों को दान देने की परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। इसी कारण इसे “दान पूर्णिमा” भी कहा जाता है।
मान्यता है कि इस दिन दीन-हीन और असहाय लोगों को दान देने से पुण्य की प्राप्ति होती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
मत्स्य पुराण में पूर्णिमा का उल्लेख करते हुए कहा गया है –
पूर्णिमा तु सदा शुभं सर्वार्थसाधनं च ।
पूर्णिमा तु सदा शुभं सर्वपापनाशनं च ।।
अर्थात् “पूर्णिमा सदैव शुभ होती है। यह सभी कार्यों को सिद्ध करने वाली और सभी पापों का नाश करने वाली होती है।”
पौष माह की पूर्णिमा पर चंद्रमा पूर्ण आकार में होता है। इस रात चंद्रमा की शीतलता अत्यंत मनोहारी मानी जाती है।
इस दिन मुख्य रूप से भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और चंद्र देव की पूजा का विधान है।
कहा जाता है कि पूर्णिमा के दिन विधिवत पूजा और दान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
पौष पूर्णिमा पर विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग परंपराओं के अनुसार पूजा की जाती है।
पौष पूर्णिमा से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं।
एक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु का अवतार हुआ था, इसलिए इस दिन विशेष रूप से विष्णु पूजा की जाती है।
धार्मिक ग्रंथों में पौष पूर्णिमा का विशेष महत्व बताया गया है।
मान्यता है कि जो जातक इस दिन व्रत रखते हैं और मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं, उनके घर में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती।
हिंदू धर्म में पूर्णिमा के दिन दान का विशेष महत्व बताया गया है।
कहा जाता है कि दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है, मन शुद्ध होता है और मानसिक शांति मिलती है।
श्रीमद् भगवद्गीता में दान का महत्व बताते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं –
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।।
अर्थात् जो दान कर्तव्य समझकर, उचित समय, स्थान और पात्र को दिया जाता है, वही सात्त्विक दान कहलाता है।
पौष पूर्णिमा पर विशेष रूप से अन्न, भोजन, वस्त्र और शिक्षा का दान करना शुभ माना जाता है।
भोजन और अन्न दान:
हिंदू धर्म में अन्न दान को सर्वोत्तम दान माना गया है।
इस दिन गरीब, असहाय और दिव्यांग लोगों को सम्मानपूर्वक भोजन कराना अत्यंत पुण्यदायक होता है।
मान्यता है कि इससे धन लाभ, मान-सम्मान की प्राप्ति होती है और मां अन्नपूर्णा की कृपा बनी रहती है।
वस्त्र दान:
पौष पूर्णिमा शीत ऋतु में आती है, इसलिए इस दिन गर्म वस्त्रों का दान करना विशेष फलदायी माना जाता है।
शिक्षा दान:
किसी बच्चे को शिक्षित करना या उसे ज्ञान देना सबसे श्रेष्ठ दान माना गया है।
इस दिन जरूरतमंद बच्चों को कॉपी, किताब, पेंसिल, पेन और स्कूल बैग का दान करना चाहिए।
यदि संभव हो, तो किसी गरीब बच्चे की शिक्षा का संकल्प लेना भी अत्यंत पुण्यदायक माना जाता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, कार्तिका नगरी में चंद्रहाश नामक राजा राज्य करता था।
उसी नगर में धनेश्वर नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। उसके पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान न होने का उसे गहरा दुःख था।
एक बार नगर में एक योगी आया। उसने ब्राह्मण का घर छोड़कर अन्य सभी घरों से भिक्षा ली और गंगा तट पर भोजन करने लगा।
इसका कारण पूछने पर योगी ने बताया कि नि:संतान के घर की भिक्षा पतितों के अन्न के समान मानी जाती है।
यह सुनकर धनेश्वर अत्यंत दुखी हुआ और उसने योगी से संतान प्राप्ति का उपाय पूछा।
योगी ने उसे मां चंडी की आराधना करने की सलाह दी।
धनेश्वर वन में जाकर नियमित रूप से मां चंडी की पूजा और उपवास करने लगा।
सोलहवें दिन मां चंडी ने स्वप्न में दर्शन देकर 32 पूर्णिमा व्रत करने पर संतान प्राप्ति का वरदान दिया।
इस प्रकार पूर्णिमा का व्रत सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला और विशेष फल प्रदान करने वाला माना गया है।