सनातन धर्म में प्रत्येक संक्रांति का अपना विशेष आध्यात्मिक महत्व होता है, लेकिन मेष संक्रांति को अत्यंत पुण्यदायी और शुभ माना गया है। जब ग्रहों के राजा सूर्यदेव मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करते हैं, तब इस पावन पर्व का आगमन होता है।
इसे कई स्थानों पर सतुआ संक्रांति, सतुआन या सतुला संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है। सतुआ संक्रांति का यह पुण्यदायी अवसर दान, स्नान, पूजा और नव ऊर्जा के आरंभ का भी शुभ अवसर है।
मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से भगवान नारायण और सूर्यदेव की उपासना करने तथा ब्राह्मणों तथा दीन-हीन, असहाय, जरूरतमंदों को सत्तू, जल और मौसमी वस्तुओं का दान करने से जीवन से दरिद्रता दूर होती है और घर में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।
हर साल की तरह इस साल भी मेष या सतुआ संक्रांति 14 अप्रैल को मनाई जाएगी।
ज्योतिष और धर्मशास्त्रों के अनुसार, सूर्य जब मेष राशि में प्रवेश करते हैं तो इसे सूर्य की उच्च राशि में प्रवेश माना जाता है। मेष राशि सूर्य की उच्च राशि मानी गई है, इसलिए यह दिन तेज, ऊर्जा, आरोग्य और शुभता का प्रतीक बन जाता है।
देश के कई भागों में इस दिन को नववर्ष के रूप में भी मनाया जाता है। तमिलनाडु, केरल, ओडिशा और बंगाल में इसी तिथि से नए वर्ष की शुरुआत मानी जाती है। यह पर्व प्रकृति में परिवर्तन, ऋतु परिवर्तन और जीवन में नवीनता का संदेश देता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन किया गया दान अक्षय पुण्य प्रदान करता है और पितरों की आत्मा को तृप्ति देता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने राजा बलि का पराभव किया था, तब उन्होंने सबसे पहले सत्तू का सेवन किया था। इसी कारण मेष संक्रांति के दिन सत्तू दान और सत्तू खाने का विशेष महत्व बताया गया है।
इस दिन भगवान नारायण को सत्तू और तुलसी दल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा करने से घर में सुख-शांति बनी रहती है और आर्थिक संकट दूर होते हैं।
कहा जाता है कि इस दिन श्रद्धा से अर्पित किया गया सत्तू भगवान को प्रिय होता है और भक्त के जीवन में समृद्धि और आरोग्य लेकर आता है।
मेष संक्रांति के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगा स्नान या किसी पवित्र नदी में स्नान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। यदि नदी स्नान संभव न हो, तो घर में स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान किया जा सकता है।
स्नान के पश्चात सूर्यदेव को अर्घ्य देना चाहिए। तांबे के लोटे में जल, लाल पुष्प, अक्षत और थोड़ा सा गुड़ डालकर सूर्य मंत्रों का उच्चारण करते हुए अर्पित करें। सूर्यदेव की कृपा से जातक के जीवन में यश, स्वास्थ्य, आत्मबल और सम्मान की प्राप्ति होती है।
इस दिन दान का विशेष महत्व है। विशेष रूप से गर्मी के मौसम की शुरुआत होने के कारण शीतलता और तृप्ति देने वाली वस्तुओं का दान श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन ब्राह्मणों तथा जरूरतमंद लोगों को निम्न चीजें दान करें-
सत्तू इस पर्व की मुख्य दान सामग्री है। इसे गरीबों, ब्राह्मणों या जरूरतमंद लोगों को दान करने से पापों का नाश होता है और देवता प्रसन्न होते हैं।
मिट्टी का घड़ा जल से भरकर दान करना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि इससे पितर तृप्त होते हैं और घर में शांति आती है।
गर्मी से राहत देने के लिए हाथ का पंखा या अन्य उपयोगी शीतल वस्तुएँ दान करना शुभ फलदायी होता है।
गुड़ सूर्यदेव को प्रिय माना जाता है। इसका दान करने से जीवन में मधुरता और शुभता आती है।
इस दिन बेल, तरबूज, खरबूजा, कच्चा आम और अन्य शीतल फल दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है।
धार्मिक मान्यता है कि मेष संक्रांति पर जल से भरा घड़ा दान करने से पूर्वजों की आत्मा तृप्त होती है। जिन परिवारों में पितृ दोष या अशांति होती है, उनके लिए यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है। पूर्वजों की कृपा से घर में सुख और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
इसके साथ ही इस दिन जल से भरा घड़ा दान करने से कुंडली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत होती है। जिससे जीवन में मानसिक शांति, स्थिरता और सौम्यता बढ़ती है। चंद्रमा मजबूत होने से मन प्रसन्न रहता है और निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होती है।
मेष संक्रांति के साथ ही शुभ कार्यों की शुरुआत हो जाती है। जिससे विवाह, उपनयन संस्कार, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों की शुरुआत की जाती है। इसलिए यह पर्व केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मेष संक्रांति दान, पुण्य, आराधना और नव आरंभ का पावन अवसर है। इस दिन श्रद्धा भाव से सूर्यदेव और भगवान नारायण की पूजा करें, गंगा स्नान करें और सत्तू, जल, फल एवं अन्य शीतल वस्तुओं का दान अवश्य करें।
प्रश्न: सतुआ संक्रांति या मेष संक्राति कब है?
उत्तर: सतुआ संक्रांति 14 अप्रैल को मनाई जाएगी।
प्रश्न: मेष संक्रांति को सतुआ संक्रांति क्यों कहा जाता है?
उत्तर: इस दिन सत्तू के दान और सेवन का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान नारायण को सत्तू अर्पित करना शुभ माना जाता है, इसलिए इसे सतुआ संक्रांति भी कहा जाता है।
प्रश्न: मेष संक्रांति पर किन चीजों का दान करना चाहिए?
उत्तर: इस दिन सत्तू, जल से भरा घड़ा, गुड़, पंखा, बेल, तरबूज, खरबूज और अन्य मौसमी फलों का दान करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
प्रश्न: सतुआ संक्रांति पर दान करने का क्या फल मिलता है?
उत्तर: मान्यता है कि इस दिन दान करने से पापों का नाश होता है, पितर तृप्त होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि तथा धन-धान्य की वृद्धि होती है।