सनातन परंपरा में एकादशी तिथि को भगवान श्रीहरि की कृपा प्राप्ति का पावन अवसर माना गया है। इन्हीं पवित्र तिथियों में वरुथिनी एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है। यह एकादशी वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में आती है और धर्मशास्त्रों के अनुसार पापों का नाश करने वाली तथा जीवन में सौभाग्य और समृद्धि प्रदान करने वाली मानी जाती है।
मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ किया गया व्रत, जप, तप और दान मनुष्य के जीवन से कष्टों को दूर करता है और उसे धर्म तथा सदाचार के मार्ग पर अग्रसर करता है। वरुथिनी एकादशी साधक के जीवन में आध्यात्मिक जागरण और सकारात्मक परिवर्तन लाती है।
वरुथिनी एकादशी का महत्व
शास्त्रों में कहा गया है कि वरुथिनी एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को पापों से मुक्ति मिलती है और उसे पुण्य एवं यश की प्राप्ति होती है। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु की विधि-विधान से पूजा, तुलसी दल अर्पण, दीपदान और मंत्र-जाप अत्यंत शुभ फलदायी माने गए हैं।
जो भक्त इस दिन सच्चे भाव से ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करते हैं और दान-पुण्य करते हैं, उनके जीवन में सुख-शांति का संचार होता है और भगवान श्रीहरि की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
दान का महत्व
सनातन परंपरा में दान को सर्वोत्तम कर्म माना गया है। एकादशी के दिन जरूरतमंदों की सहायता करना और भूखों को भोजन कराना सच्ची भक्ति मानी जाती है। निस्वार्थ सेवा से मनुष्य का हृदय पवित्र होता है और जीवन में संतोष का भाव उत्पन्न होता है।
दान के महत्व का उल्लेख करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है-
तुलसी पंछिन के पिये, घटे न सरिता नीर
दान दिये धन ना घटे, जो सहाय रघुवीर
अर्थात जैसे पक्षियों के नदी का पानी पीने से नदी का जल कम नहीं होता, वैसे ही जब आपके साथ भगवान का आशीर्वाद हो तब परोपकार और दान देने से घर में कभी धन की कमी नहीं होती।
वरुथिनी एकादशी पर सेवा का पुण्यदायी अवसर
वरुथिनी एकादशी के इस पावन अवसर पर नारायण सेवा संस्थान के दीन-हीन, असहाय एवं दिव्यांग बच्चों को भोजन कराने के सेवा प्रकल्प में सहयोग करके पुण्य के भागी बनें।