सनातन धर्म में एकादशी तिथि को भगवान श्रीहरि की कृपा प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन माना गया है। इन्हीं पावन तिथियों में पापमोचिनी एकादशी का विशेष महत्व है। यह एकादशी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में आती है और अपने नाम के अनुरूप साधक के पापों को नष्ट करने वाली मानी जाती है।
धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा-भाव से किया गया व्रत, जप, तप और दान मनुष्य के अंतःकरण को शुद्ध करता है तथा उसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करता है।
पापमोचिनी एकादशी का महत्व
शास्त्रों में वर्णित है कि पापमोचिनी एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के संचित पाप नष्ट होते हैं और उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा, तुलसी दल अर्पण, दीपदान और मंत्र-जाप अत्यंत शुभफलदायक माना गया है। जो भक्त सच्चे हृदय से “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करते हैं, उनके जीवन से नकारात्मकता दूर होती है।
दान और सेवा
पापमोचिनी एकादशी के दिन अन्नदान को सर्वोच्च पुण्य कार्य बताया गया है। भूखे को भोजन कराना, असहाय को सहारा देना और दिव्यांगजनों की सहायता करना सच्ची भक्ति का प्रतीक है। जब हम निस्वार्थ भाव से किसी की सहायता करते हैं तब हमारे भीतर का अहंकार समाप्त होता है और आत्मा निर्मल होती है।
श्रीमद्भगवद्गीता में दान के महत्व का उल्लेख करते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥
यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याग करने के योग्य नहीं हैं, बल्कि वे अवश्य करने योग्य हैं; क्योंकि यज्ञ, दान और तप; ये तीनों ही कर्म बुद्धिमानों (मनीषियों) को पवित्र करने वाले हैं।
पापमोचिनी एकादशी पर सेवा का पुण्य अवसर
पापमोचिनी एकादशी के इस पावन अवसर पर नारायण सेवा संस्थान के माध्यम से दीन-हीन, असहाय एवं दिव्यांग बच्चों को भोजन कराकर आप भी इस पुण्य कार्य में सहभागी बनें। मान्यता है कि इस दिन भूखे को भोजन कराने और जरूरतमंद की सहायता करने से भगवान विष्णु स्वयं प्रसन्न होकर आरोग्य, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।