इस आषाढ़ शुक्ल पक्ष की इस पावन एकादशी से भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में चार माह की योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इसी दिन से चातुर्मास का शुभारंभ होता है, जिसे साधना, जप, तप, दान, सेवा और आत्मचिंतन का सर्वोत्तम काल माना गया है। धर्मग्रंथों के अनुसार देवशयनी एकादशी का श्रद्धापूर्वक व्रत एवं भगवान विष्णु की आराधना करने से समस्त पापों का क्षय होता है तथा जीवन में सुख, शांति और भगवान की कृपा प्राप्त होती है।
देवशयनी एकादशी का दिन सेवा, परोपकार और दान के माध्यम से पुण्य अर्जित करने का श्रेष्ठ अवसर माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के नाम का स्मरण, विष्णु सहस्रनाम का पाठ तथा जरूरतमंदों की सहायता करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
देवशयनी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व
शास्त्रों में वर्णित है कि देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होने वाला चातुर्मास आध्यात्मिक उन्नति का विशेष काल है। इस अवधि में किए गए धर्म कार्यों का फल कई गुना बढ़कर प्राप्त होता है। यह दिन मन, वचन और कर्म की शुद्धि का संदेश देता है तथा भक्तों को प्रभु की भक्ति और लोककल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
सनातन की दिव्य परंपरा में दान को सर्वोत्तम कर्म माना गया है। रामचरितमानस में दान के महत्व का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है-
प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान।
जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान॥
धर्म के चार चरण सत्य, दया, तप और दान प्रसिद्ध हैं, जिनमें से कलियुग में सिर्फ दान रूपी चरण ही प्रधान है। किसी प्रकार से भी दिए जाने पर दान कल्याण ही करता है।
देवशयनी एकादशी पर अन्नदान कर पुण्य के भागी बनें
देवशयनी एकादशी के पुण्यदायी अवसर पर नारायण सेवा संस्थान के सेवा प्रकल्प से जुड़कर दीन-हीन, असहाय, दिव्यांग एवं जरूरतमंद बच्चों के भोजन हेतु अपना सहयोग प्रदान करें।
इस एकादशी पर सेवा, दान और करुणा के इस पावन संकल्प में सहभागी बनें। आपका एक छोटा-सा सहयोग किसी जरूरतमंद के जीवन में तृप्ति, आशा और ईश्वर की कृपा का माध्यम बनेगा।