जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ा, धर्म की रक्षा और भक्तों का उद्धार करने के लिए भगवान ने अवतार लिया। द्वापर युग में भी जब अत्याचार और अधर्म अपने चरम पर पहुंचने लगा, तब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेकर धर्म की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ भगवान श्रीकृष्ण का जन्म आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए आस्था और भक्ति का पावन अवसर है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। इसे श्रीकृष्ण जन्मोत्सव और गोकुलाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। मथुरा, वृंदावन, गोकुल और द्वारका सहित देशभर के कृष्ण मंदिरों में इस दिन विशेष पूजा, भजन, कीर्तन और धार्मिक आयोजन होते हैं।
वर्ष 2026 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप यानी लड्डू गोपाल की विशेष पूजा की जाती है।
जन्माष्टमी की पूजा का शुभ समय 4 सितंबर की रात 11:57 बजे से 12:43 बजे तक रहेगा। इसी मध्यरात्रि काल में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाएगा। जन्माष्टमी व्रत का पारण 5 सितंबर की सुबह 06:01 बजे के बाद किया जाएगा।
मथुरा के राजा उग्रसेन के पुत्र कंस ने अपनी बहन देवकी का विवाह वासुदेव जी से किया था। विवाह के बाद जब कंस स्वयं अपनी बहन को ससुराल पहुंचाने जा रहा था, तभी आकाशवाणी हुई कि देवकी की आठवीं संतान ही कंस के विनाश का कारण बनेगी।
यह सुनकर कंस भयभीत हो गया और उसने देवकी तथा वासुदेव को कारागार में बंद कर दिया। देवकी की संतानों को कंस ने एक-एक करके मार डाला। लेकिन जब भगवान श्रीकृष्ण के रूप में आठवीं संतान का जन्म हुआ, तब कारागार के द्वार अपने आप खुल गए और पहरेदार निद्रा में चले गए।
वासुदेव जी नवजात श्रीकृष्ण को टोकरी में रखकर उफनती हुई यमुना पार गोकुल पहुंचे। गोकुल में नंद बाबा के यहां यशोदा जी ने एक कन्या को जन्म दिया था। वासुदेव ने कृष्ण को यशोदा के पास सुलाया और उस कन्या को ले आए।
कंस ने जब उस कन्या को मारना चाहा, वह योगमाया बनकर आकाश में विलीन हो गई। योगमाया ने चेतावनी दी कि कंस का काल जन्म ले चुका है। बाद में श्रीकृष्ण का पालन-पोषण गोकुल में नंद और यशोदा ने अपना पुत्र मानकर किया।
श्रीकृष्ण प्रेम, करुणा, नीति और धर्म के प्रतीक हैं। बाल रूप में वे नटखट कान्हा हैं, गोपियों के प्रिय हैं, तो कुरुक्षेत्र में अर्जुन के सारथी बनकर उन्हें धर्म और कर्म का उपदेश देते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवद्गीता के माध्यम से मानव जीवन को कर्म, भक्ति और धर्म का मार्ग दिखाया। उनका संदेश है कि मनुष्य को अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिए और फल की चिंता किए बिना धर्मपूर्वक कर्म करते रहना चाहिए। इसीलिए जन्माष्टमी भगवान के जन्म के उत्सव के साथ ही उनके दिव्य संदेशों को अपने जीवन में उतारने का अवसर भी है।
जन्माष्टमी का व्रत भगवान श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा और भक्ति का संकल्प है। व्रत रखने के लिए सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। अपनी सामर्थ्य और स्वास्थ्य के अनुसार व्रत रखें। जो श्रद्धालु निर्जल व्रत रखने में सक्षम हों, वे निर्जल रह सकते हैं; अन्यथा फलाहार या सात्विक व्रत रख सकते हैं। व्रत के दौरान अन्न और सामान्य भोजन न करने की धार्मिक परंपरा है।
दिनभर भगवान श्रीकृष्ण के नाम का जाप करें या कृष्ण भजन और कीर्तन सुनें। शाम को स्नान करके भगवान की जन्माष्टमी पूजा की तैयारी करें। मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद पूजा, अभिषेक, आरती और भोग लगाएं।
इसके बाद अपनी व्रत परंपरा और स्थानीय पंचांग में दिए गए पारण समय के अनुसार व्रत खोलें। व्रत खोलते समय भगवान का प्रसाद ग्रहण करें और संभव हो तो किसी जरूरतमंद को भोजन या दान देकर अपनी श्रद्धा अर्पित करें।
जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप यानी लड्डू गोपाल की पूजा करें। मान्यता है कि मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था, इसलिए रात 12 बजे के आसपास उनकी पूजा और जन्मोत्सव मनाने की परंपरा है।
पूजा की विधि इस प्रकार है-
श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में माखन चोरी की लीला सबसे मनमोहक मानी जाती है। बाल गोपाल को माखन और दही अत्यंत प्रिय थे। वे अपने सखाओं के साथ मिलकर गोपियों के घरों से माखन चुरा लिया करते थे। इसी कारण उन्हें प्रेम से ‘माखन चोर’ भी कहा गया।
भगवान की इसी बाल लीला की स्मृति में जन्माष्टमी के अवसर पर दही-हांडी का आयोजन किया जाता है। विशेष रूप से महाराष्ट्र और गोवा में यह परंपरा बड़े उत्साह के साथ निभाई जाती है। दही या माखन से भरी हांडी को ऊंचाई पर बांधा जाता है और युवाओं की टोली मानव पिरामिड बनाकर उसे फोड़ने का प्रयास करती है। ‘गोविंदा आला रे’ के जयघोष के साथ पूरा वातावरण कृष्णमय हो उठता है।
शास्त्रों और भारतीय धार्मिक परंपरा में दान और सेवा को सदैव पुण्यकारी माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी मानव जीवन में करुणा और परोपकार को महत्वपूर्ण स्थान दिया। इसलिए जन्माष्टमी के पावन अवसर पर जरूरतमंदों की सहायता करना भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा का सुंदर माध्यम बन सकता है।
इस दिन जरूरतमंद परिवारों को भोजन कराना, असहाय लोगों की सहायता करना या किसी जरूरतमंद के जीवन में खुशियां लाने का प्रयास करना पुण्यदायी माना जाता है। भगवान को केवल मंदिर में नहीं, बल्कि जरूरतमंदों की सेवा में भी अनुभव किया जा सकता है।
जन्माष्टमी हमें याद दिलाती है कि जब जीवन में अधर्म और अंधकार बढ़ता है, तब ईश्वर की कृपा का प्रकाश अवश्य प्रकट होता है। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन हमें बताता है कि प्रेम में शक्ति है, धर्म में विजय है और नि:स्वार्थ कर्म ही जीवन को सार्थक बनाता है।
इस जन्माष्टमी प्रेम और धर्म के संदेश को अपने जीवन का हिस्सा बनाने का संकल्प लें। घर में लड्डू गोपाल का स्वागत करें, कृष्ण नाम का स्मरण करें, जरूरतमंदों की सेवा करें और अपने भीतर के अहंकार, क्रोध और नकारात्मकता को त्यागकर प्रेम और मानवता का दीप जलाएं। और अंत में श्रीकृष्ण के चरणों में प्रणाम करते हुए-
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतः क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥
जय श्रीकृष्ण!