18 February 2026

फाल्गुन पूर्णिमा 2026 : जानें तिथि, शुभ मुहूर्त, चंद्र ग्रहण का समय

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सनातन धर्म में फाल्गुन मास की पूर्णिमा अत्यंत पवित्र और पुण्यदायिनी मानी जाती है। इसी दिन होलिका दहन का पर्व मनाया जाता है और अगले दिन रंगोत्सव होली का उत्साह पूरे देश में दिखाई देता है। धार्मिक दृष्टि से यह दिन भगवान श्रीहरि विष्णु और माता महालक्ष्मी को समर्पित है। अतः इस दिन पूजन, स्नान-दान और भक्ति करने का विशेष महत्व बताया गया है।

 

फाल्गुन पूर्णिमा 2026 की तिथि एवं शुभ मुहूर्त

वैदिक पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में फाल्गुन पूर्णिमा की तिथि 2 मार्च सायं 5 बजकर 55 मिनट से प्रारंभ होकर 3 मार्च सायं 5 बजकर 7 मिनट तक रहेगी। चूंकि 3 मार्च को चंद्र ग्रहण का योग बन रहा है, अतः परंपरानुसार 2 मार्च को होलिका दहन किया जाएगा तथा 04 मार्च को रंगों का पर्व होली मनाई जाएगी।

हालांकि किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से पूर्व अपने स्थानीय पंचांग, विद्वान पंडित या ज्योतिषाचार्य से परामर्श अवश्य कर लें, क्योंकि स्थान विशेष के अनुसार मुहूर्त में परिवर्तन संभव है।

 

फाल्गुन पूर्णिमा का आध्यात्मिक महत्व

धर्म शास्त्रों में फाल्गुन पूर्णिमा को स्नान-दान, जप-तप और पूजा-पाठ के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से भगवान विष्णु की आराधना करने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर हो जाती हैं। माता लक्ष्मी की पूजा से आर्थिक संकट समाप्त होते हैं और घर-परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है।

पूर्णिमा का चंद्रमा मन और भावनाओं का प्रतीक है, अतः इस दिन ध्यान और साधना करने से मानसिक शांति तथा सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। इस पावन तिथि पर गंगा स्नान या किसी पवित्र नदी में स्नान करने का विशेष महत्व है। यदि तीर्थ स्नान संभव न हो तो घर में ही जल में गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं। इसके पश्चात दान-पुण्य, विशेषकर अन्न, वस्त्र और धन का दान करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है।

 

फाल्गुन पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण 2026

वर्ष 2026 में फाल्गुन पूर्णिमा के दिन चंद्र ग्रहण का योग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रहण काल में सूतक नियम लागू होते हैं। सूतक लगने के बाद से मंदिरों के पट बंद कर दिए जाते हैं और शुभ कार्यों को स्थगित किया जाता है। ग्रहण के समय भगवान विष्णु के मंत्रों का जप करना अत्यंत फलदायी माना गया है। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और आध्यात्मिक उन्नति होती है। ग्रहण समाप्ति के पश्चात स्नान-ध्यान कर पुनः पूजा-अर्चना करें तथा दान अवश्य करें। ऐसा करने से ग्रहण के अशुभ प्रभावों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है।

 

होलिका दहन का महत्व

फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि में होलिका दहन किया जाता है। यह केवल एक पर्व नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। होलिका दहन की अग्नि में लोग अपनी बुराइयों, अहंकार और नकारात्मक विचारों को समर्पित करते हैं। अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करने से रोग-दोष और भय का नाश होता है। कई स्थानों पर नई फसल की बालियों को अग्नि में अर्पित कर समृद्धि की कामना की जाती है।

 

फाल्गुन पूर्णिमा की कथा

पुराणों के अनुसार प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नामक असुर राजा था। वह अत्यंत अहंकारी था और स्वयं को ईश्वर से भी श्रेष्ठ मानता था। उसने अपने राज्य में भगवान की भक्ति पर प्रतिबंध लगा दिया और सभी को अपनी ही पूजा करने का आदेश दिया। किन्तु उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। पिता के बार-बार समझाने और धमकाने के बाद भी उसने श्रीहरि की भक्ति त्यागने से इनकार कर दिया।

क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के अनेक प्रयास किए, परंतु हर बार भगवान विष्णु की कृपा से वह सुरक्षित बच गया। अंततः हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की सहायता ली, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था। योजना के अनुसार होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई। परंतु दैवीय लीला से वरदान निष्फल हो गया। अग्नि में होलिका भस्म हो गई, जबकि भक्त प्रह्लाद सकुशल बाहर आ गया।

 

इस दिन रखें इन बातों का ध्यान

सात्विक भोजन करें और नकारात्मक विचारों से दूर रहें।
असत्य बातचीत और विवाद से बचें।
जरूरतमंदों की सहायता करें।
परिवार और समाज के साथ प्रेम और सौहार्द बनाए रखें।

फाल्गुन पूर्णिमा आत्मशुद्धि, भक्ति और आध्यात्मिक जागरण का अवसर है। होलिका दहन हमें यह संदेश देता है कि जीवन की अग्नि में यदि श्रद्धा और विश्वास दृढ़ हो, तो हर विपत्ति स्वयं नष्ट हो जाती है। भगवान श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा से यह पावन तिथि सभी के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लेकर आए।

॥ हरि: ॐ ॥

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