सनातन परंपरा में कुछ तिथियाँ ऐसी होती हैं, जो जीवन-दर्शन का जीवंत संदेश देती हैं। ऐसी ही एक परम पावन तिथि है अक्षय तृतीया। जिसे आखा तीज या अक्ती तीज के नाम से जाना जाता है। इस पर्व में अक्षय शब्द का अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो, अर्थात् जो सदा बना रहे, जो अनंत हो। यही कारण है कि इस दिन किया गया जप, तप, दान, सेवा, हवन या कोई भी शुभ कार्य अक्षय फल प्रदान करने वाला माना गया है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व आत्मिक उन्नति, धर्म, सेवा और सद्कर्म की कभी न समाप्त होने वाली परंपरा का स्मरण कराता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह तिथि कालचक्र के परिवर्तन की साक्षी है। पौराणिक कथाओं और इतिहास के अनुसार इस दिन निम्नलिखित चीजें घटित हो चुकी हैं-
युगादि तिथि: हिंदू समय गणना के अनुसार, अक्षय तृतीया के दिन ही सतयुग का समापन हुआ था और त्रेतायुग का आरंभ हुआ था।
परशुराम जयंती: भगवान विष्णु के छठे अवतार, शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता भगवान परशुराम का प्राकट्य इसी तिथि को हुआ था।
गंगा अवतरण: भगीरथ की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा इसी दिन स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं, जिससे समस्त जीवों का उद्धार संभव हुआ।
अक्षय पात्र की प्राप्ति: महाभारत काल में पांडवों के वनवास के दौरान, सूर्यदेव ने उन्हें अक्षय पात्र प्रदान किया था, जिससे उन्हें कभी अन्न की कमी नहीं हुई।
सुदामा और कृष्ण का मिलन: द्वारकाधीश श्रीकृष्ण ने अपने परम मित्र सुदामा की दरिद्रता का नाश इसी तिथि को किया था।
द्रिक पंचांग के अनुसार, वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि का आरंभ 19 अप्रैल 2026 को प्रातः 10 बजकर 49 मिनट पर होगा और समापन 20 अप्रैल 2026 को प्रातः 7 बजकर 27 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार, अक्षय तृतीया का पर्व 19 अप्रैल 2026 को मनाया जाएगा। इस दिन स्वर्ण क्रय का शुभ समय 19 अप्रैल प्रातः 10:49 से 20 अप्रैल प्रातः 06:14 तक विशेष मंगलकारी माना गया है।
अक्षय तृतीया की एक अनूठी विशेषता यह है कि इसे अबूझ मुहूर्त कहा जाता है। अर्थात् इस दिन किसी भी शुभ कार्य के लिए विशेष मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। विवाह, गृह प्रवेश, भूमि पूजन, नया व्यापार आरंभ, वाहन क्रय, आभूषण खरीदना जैसे सभी कार्य इस दिन स्वतः सिद्ध माने जाते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, वर्ष में कुछ ही तिथियाँ ऐसी होती हैं जो समस्त अशुभ प्रभावों से मुक्त मानी जाती हैं, और अक्षय तृतीया उनमें से एक है।
अक्षय तृतीया पर सोने की खरीदारी एक प्राचीन परंपरा है। वैदिक काल से ही स्वर्ण को केवल धातु नहीं, बल्कि साक्षात महालक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। चूंकि यह ‘अक्षय’ तिथि है, इसलिए मान्यता है कि इस दिन खरीदे गए स्वर्ण का कभी क्षरण नहीं होता। यह केवल भौतिक संपत्ति नहीं, बल्कि परिवार में सौभाग्य की निरंतरता का प्रतीक है। भगवान विष्णु, जो सृष्टि के पालनहार हैं, और माता लक्ष्मी, जो ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री हैं, इस दिन स्वर्ण के रूप में जातक के घर में स्थिर वास करती हैं। विशेषकर घर की स्त्रियां, जिन्हें गृह लक्ष्मी कहा जाता है, इस दिन आभूषण क्रय कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
अक्षय तृतीया का पर्व भगवान विष्णु के लक्ष्मीनारायण स्वरूप को समर्पित है। साथ ही यह दिन स्वर्ग के खजांची कुबेर देव के लिए भी समर्पित है। इस दिन भक्त ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र नदियों में स्नान करें। यदि संभव न हो, तो घर पर ही जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
अक्षय तृतीया पर दान का महत्व भौतिक सुखों से कहीं अधिक है। शास्त्रों में वर्णित है कि इस दिन किया गया दान जातक के संचित पापों का क्षय करता है।
अक्षय तृतीयायां दानं, पुण्यं च न क्षीयते।
अर्थात् अक्षय तृतीया के दिन किया गया दान और अर्जित किया गया पुण्य कभी समाप्त नहीं होता। सनातन परंपरा में ऐसा माना जाता है कि इस दिन दान करने से धन का ह्रास नहीं होता बल्कि दान से धन-संपदा में वृद्धि होती है।
अन्नदानम् परं दानम् अर्थात् अन्न को धार्मिक ग्रंथों में परब्रह्म कहा गया है। अक्षय तृतीया पर किसी भूखे को भोजन कराना साक्षात नारायण की सेवा के समान है। ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ होने के कारण इस दिन सत्तू, गुड़ और शीतल जल के दान का विशेष महत्व है।
प्यासे को पानी पिलाना सबसे बड़ी मानवता है। इस दिन मिट्टी के घड़े (कुंभ) में जल भरकर दान करने से पितरों की आत्मा को तृप्ति मिलती है।
अक्षय तृतीया पर दान केवल वस्तु का त्याग नहीं है, बल्कि अहंकार का विसर्जन है। यह आत्मा को निर्मल करता है और कर्मों की श्रृंखला में ऐसे बीज बोता है, जिनका फल जन्म-जन्मांतर तक अक्षय रहता है।
इस पावन दिवस पर निम्न धार्मिक कार्य विशेष रूप से किए जाते हैं-
संसार में सब कुछ नश्वर है, सिवाय हमारे द्वारा किए गए सत्कर्मों के। सोना खरीदना समृद्धि का प्रतीक है, लेकिन किसी दुखी के आंसू पोंछना और किसी भूखे को अन्न खिलाना उस समृद्धि को ‘अक्षय’ बनाता है। इस आखा तीज, हम केवल अपने लिए वैभव न मांगें, बल्कि संसार के समस्त प्राणियों के कल्याण की कामना करें। अपनी आत्मा को जाग्रत करें और सेवा, सुमिरन व समर्पण के पथ पर आगे बढ़ें। ईश्वर से प्रार्थना है कि इस अक्षय तृतीया पर सभी के जीवन में धर्म का दीप, सेवा की भावना और पुण्य का अक्षय प्रवाह सदैव बना रहे।
प्रश्न: आखा तीज क्यों मनाई जाती है?
उत्तर: आखा तीज, जिसे अक्षय तृतीया भी कहा जाता है, इस दिन शुभ कार्य करने तथा दान-पुण्य करने से कभी न समाप्त होने वाला अक्षय फल प्राप्त होता है। इसलिए वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया के दिन यह पर्व मनाया जाता है।
प्रश्न: अक्षय तृतीया पर किसकी पूजा होती है?
उत्तर: अक्षय तृतीया पर मुख्य रूप से लक्ष्मीनारायण की पूजा की जाती है। साथ ही धन के देवता भगवान कुबेर की भी पूजा की जाती है।
प्रश्न: वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया क्यों कहा जाता है?
उत्तर: पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनसे कभी न समाप्त होने वाला अक्षय फल प्राप्त होता है। इसलिए इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है।
प्रश्न: अक्षय तृतीया 2026 पर क्या करें?
उत्तर: दीन-हीन, असहाय, निर्धन, जरुरतमन्द लोगों को दान दें। लक्ष्मीनारायण और कुबेर देव की पूजा करें, सोना खरीदें और नए उद्यम शुरू करें।
प्रश्न: आखा तीज पर सोना क्यों खरीदें?
उत्तर: सोना धन का प्रतीक है और माना जाता है कि इस दिन खरीदा गया सोना अनंत समृद्धि लाता है।