श्राद्ध-पितृ पक्ष 2026

अपने पितरों को दें श्रद्धांजलि

कराएं श्रीमद् भागवत मूलपाठ एवं दीन-दु:खीजनों के लिए मीठा भोजन सेवा

श्राद्ध पक्ष के इस पुण्यकाल में अन्न सेवा का संकल्प लें
पितृ-पक्ष का भाव

पितरों का स्मरण एवं सेवा का संकल्प

जब मनुष्य इस नश्वर देह को त्यागकर अनंत यात्रा पर अग्रसर होता है, तब उसकी स्मृति, संस्कार और कृपा उसकी संतति के जीवन में प्रवाहित होती रहती है। उन दिवंगत पितृदेवों की आत्मा की शांति, तृप्ति और मोक्ष की कामना से जो श्रद्धा, विधि और समर्पण के साथ दानादि किए जाते हैं; वही श्राद्ध कर्म कहलाता है।

“श्राद्ध” केवल एक कर्म नहीं, अपितु हृदय की गहराइयों से उमड़ा वह भाव है जिसमें श्रद्धा, विश्वास और कृतज्ञता का संगम होता है। यह वह पावन साधना है जिसके माध्यम से मनुष्य अपने पितृऋण को स्मरण करता है और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता अर्पित करता है।

शास्त्रों में वर्णित है कि मनुष्य का अस्तित्व केवल वर्तमान तक सीमित नहीं, बल्कि वह अपने पूर्वजों के पुण्य, संस्कार और आशीर्वाद का परिणाम है। अतः श्राद्ध कर्म द्वारा व्यक्ति अपने जीवन के मूल स्रोत; पितरों के प्रति विनम्र वंदन करता है और उनके ऋण से उऋण होने की कामना करता है।

इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो य उपरास ईयुः।

ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु॥

ऋग्वेद में वर्णित इस श्लोक का भाव है कि जो पितर पहले हो चुके हैं, जो वर्तमान में पितृलोक में स्थित हैं और जो दिवंगत होकर सूक्ष्म रूप में विद्यमान हैं, उन सभी पितरों को हमारा नमन है।

पूजन में अर्पित पुष्प एवं पिंड
मूल पाठ

सप्तदिवसीय श्रीमद् भागवत मूलपाठ

पितृ पक्ष की यह पावन बेला अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर है। इस पुण्य काल में सप्तदिवसीय श्रीमद् भागवत मूल पाठ का आयोजन अत्यंत फलदायी और कल्याणकारी माना गया है। श्रीमद् भागवत भगवान की भक्ति, ज्ञान और धर्म का दिव्य प्रकाश है, जो जीवात्मा को परमात्मा के चरणों से जोड़ने का मार्ग प्रशस्त करता है।

मान्यता है कि पितरों के उद्धार और उनकी शांति के निमित्त श्रद्धा एवं भक्ति से किया गया श्रीमद् भागवत पाठ उनके प्रति समर्पित एक पवित्र साधना है। जब संतति अपने पितरों के कल्याण की भावना से इस दिव्य अनुष्ठान में सहभागी बनती है, तब भगवान की कृपा का मार्ग प्रशस्त होता है और पितृऋण से मुक्ति की भावना सार्थक होती है।

श्रीमद् भागवत मूल पाठ
भागवत मूलपाठ आयोजन
भागवत मूलपाठ आयोजन
अन्नदान सेवा

दीन-दु:खीजन भोजन सेवा

श्राद्ध कर्म में दीन-हीन, असहाय, जरूरतमंदों को अन्नदान का विशेष महत्व माना गया है। पितृ पक्ष की यह पावन बेला पितरों के निमित्त सेवा, दया और परोपकार करने का अवसर है। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धा और विनम्र भाव से किया गया अन्नदान पितरों को समर्पित होता है और उनके प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट करता है।

श्राद्ध पक्ष में दीन-दुखियों, असहायों और जरूरतमंदों को सात्विक एवं तृप्तिदायक भोजन कराना पुण्यदायी माना गया है। जब किसी भूखे और जरूरतमंद के जीवन में अन्न के माध्यम से संतोष आता है, तो वही सेवा पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि का स्वरूप बन जाती है। अन्नदान केवल उदर की तृप्ति नहीं करता, बल्कि सेवा करने वाले के मन में करुणा, श्रद्धा और परोपकार के संस्कार भी जागृत करता है।

पितृ पक्ष में अपने पितरों का स्मरण करते हुए उनके निमित्त भोजन सेवा करना धर्म, श्रद्धा और मानवता का सुंदर संगम है। मान्यता है कि ऐसे सत्कर्मों से पितृ प्रसन्न होते हैं और अपने वंशजों को सुख, शांति, समृद्धि एवं सद्बुद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। इसलिए इस पावन अवसर पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन कराकर पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करें और उनके निमित्त पुण्य सेवा में सहभागी बनें।

जरूरतमंदों की भोजन सेवा
जरूरतमंदों की भोजन सेवा
जरूरतमंदों की भोजन सेवा
जरूरतमंदों की भोजन सेवा
जरूरतमंदों की भोजन सेवा
जरूरतमंदों की भोजन सेवा
एक झलक

इस पुण्यदायी आयोजन की संपूर्ण अनुभूति को देखें।

पितृ-पक्ष 2026 में आयोजित श्रीमद् भागवत मूलपाठ एवं जरूरतमंदों की भोजन सेवा इस लघु वीडियो में।

श्राद्ध पक्ष 2026 वीडियो
पितृ सेवा संकल्प

पितरों के निमित्त सेवा का संकल्प लेकर पुण्य धारा से जुड़ें

भागवत पाठ

सप्तदिवसीय श्रीमद्भागवत मूलपाठ में सहभागी बनने का अवसर।

अन्न सेवा

जरूरतमंद एवं असहाय लोगों के लिए एक समय के भोजन में सहयोग।

पितृ स्मरण

अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर।

मानव सेवा

पितृ-पक्ष के पावन अवसर पर जरूरतमंदों की सेवा से जुड़ने का अवसर।

पितृ-पक्ष का पावन संकल्प

श्रद्धा से पितरों का स्मरण करें, सेवा से पुण्य अर्जित करें

पितृ-पक्ष सनातन परंपरा में कृतज्ञता और पुण्य कर्मों का पावन काल है। इन दिनों पितरों का स्मरण करते हुए उनके निमित्त शुभ कर्म करें।

आइए, इस पावन अवसर पर अपने पितरों की स्मृति में श्रीमद्भागवत मूलपाठ से जुड़ें, जरूरतमंदों के लिए भोजन सेवा में सहयोग करें, और सेवा का पावन संकल्प लें।
दान करें

Bank Details

Account Name
Narayan Seva Sansthan
Bank Name
STATE BANK OF INDIA
Account Number
31505501196
IFSC Code
SBIN0011406
Avail tax exemption under Section 80G
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आयुः पुत्रान् यशः स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।
पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्॥

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अर्थात् पितरों के निमित्त श्राद्ध आदि करने से मनुष्य को दीर्घायु, संतान, यश, स्वर्ग, कीर्ति, स्वास्थ्य, बल, ऐश्वर्य, पशुधन, सुख और धन-धान्य की प्राप्ति होती है।